मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (कहानी)।Mokshada ekadashi vrat katha(kahani).

5 Min Read

मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष मे की एकादशी को कहा जाता है। द्वापर युग में इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। गीता जैसे महान ज्ञान देने के कारण इस दिन को गीता जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। गीता को सभी वेदों और उपनिषदों का सार भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण द्वारा गीता ज्ञान देने के कारण इस एकादशी का महत्व बहुत ज्यादा होता है।

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (कहानी)

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा – भगवान श्री कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा सुनाते हुए कहते हैं कि हे धर्मराज! एक समय गोकुल नगर में वैखानस नामक राजा था। उसके राज्य में चारों वेदों का ज्ञान रखने वाले पंडित रहते थे। राजा अपनी प्रजा का बहुत अच्छे से पालन करता था। एक बार रात्रि में राजा वैखानस ने एक स्वप्न देखा कि उसके पिता नरक में हैं। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।सुबह होते ही राजा ब्राह्मणों के पास गया और अपने स्वप्न के बारे में बताया। और कहा कि – मैंने अपने पिता को नरक में कष्ट झेलते हुए देखा है। उन्होंने मुझसे कहा कि हे पुत्र मैं नरक में हूँ। यहाँ से तुम मुझे मुक्त कराओ। जब से मैंने यह सपना देखा हैं तब से मैं बहुत बेचैन हो रहा हूँ। मेरा मन बहुत अशांत है। मुझे यह महान राज्य भी सुख दे पा रहा है। हे पंडितो! कृपया मुझे बताए मै क्या करूँ?

राजा ने कहा- हे ब्राह्मण देवताओं! इस सपने की पीड़ा के कारण मेरा सारा शरीर जलने जैसा लग रहा है। अतः अब आप ही कृपा करके कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को नरक से मुक्ति मिल जाए। जिस पुत्र के माता-पिता का उद्धार न कर सके उस पुत्र का जीना व्यर्थ है। एक उत्तम पुत्र वही हो सकता है जो अपने माता-पिता तथा पूर्वजों का उद्धार करता है, वह अकेला ही हजार मुर्ख पुत्रों से अच्छा है। पंडितो ने कहा- हे राजन! यहाँ पास ही भूत, भविष्य, वर्तमान के महाज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है। आपकी समस्या का हल वे जरूर करेंगे।

पंडितो के कहने पर राजा पर्वत मुनि के आश्रम में गया। उस आश्रम में शांत चित्त योगी और मुनि तपस्या कर रहे थे। तथा वही पर पर्वत मुनि भी बैठे थे। राजा ने मुनि को साष्टांग दंडवत करते हुए प्रणाम किया। मुनि ने राजा से राज्य की कुशलता और आने का कारण पूछा । राजा ने कहा कि हे महामुनि! आपकी कृपा से राज्य में सब कुशल मंगल हैं, लेकिन मेरा मन बहुत अशांत है। राजा के इस वचन सुनकर पर्वत मुनि ने आँखें बंद की और भूत विचारने लगे। फिर बोले हे राजन! मैंने योग के बल से तुम्हारे स्वप्न का अर्थ जान लिया है। तुम्हारे पिता ने बहुत कुकर्म किए है। उन्होंने पूर्व जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति दी किंतु सौत के कहने पर दूसरे पत्नी को ऋतुदान माँगने पर भी नहीं दिया। उसी पाप के फलस्वरूप तुम्हारे पिता को नर्क में जाना पड़ा।

तब राजा ने दुखी स्वर में पर्वत मुनि को कहा कि हे महामुनि! आप ‍इसका कोई उपाय बताइए। मुनि बोले- हे राजन! आप मार्गशीर्ष की शुक्ल पक्ष की एकादशी मोक्षदा एकादशी का उपवास करें और उस उपवास के पुण्य के फल को अपने पिता को दे दें। इसके प्रभाव से आपके पिता की अवश्य नर्क से मुक्ति होगी। मुनि की बात सुनकर राजा प्रसन्न हुआ और अपने महल लौट गया और मुनि के बताए अनुसार अपने पूरे परिवार सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत पूरे विधि विधान से किया। इसके उपवास का पुण्य उसने पिता को अर्पण कर दिया। इसके प्रभाव से उसके पिता को नर्क से मुक्ति मिल गई और स्वर्ग में चले गए तथा जाते हुए अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और कहने लगे- हे पुत्र तेरा कल्याण हो। यह कहकर स्वर्ग चले गए।

मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी मोक्षदा एकादशी का जो भी व्यक्ति व्रत करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस व्रत से बढ़कर मोक्ष देने वाला और कोई अन्य व्रत नहीं है। इस कथा को पढ़ने या सुनने से वायपेय यज्ञ के समान फल मिलता है। यह व्रत मोक्ष देने वाला तथा सब कामनाएँ पूर्ण करने वाला व्रत है।

यह भी पढ़े –

विनायक जी की कहानी

Share This Article