Jaya ekadashi vrat katha, vrat kahani. जया एकादशी व्रत कथा ।

एकादशीJaya ekadashi vrat katha, vrat kahani. जया एकादशी व्रत कथा ।

माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को जया एकादशी के नाम से जाना जाता है। मनोकामना पूर्ति के लिहाज से भी जया एकादशी बेहद खास मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जया एकादशी व्रत की महिमा से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

जया एकादशी व्रत कथा 2022 –

जया एकादशी व्रत कथा – जया एकादशी के बारे में पूछते हुए अर्जुन ने कहा- ” हे भगवन् ! अब कृपा कर आप मुझे माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के सम्बंध में भी विस्तारपूर्वक बताएं । शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात् जया एकादशी में किस देवता का पूजन करना चाहिए तथा इस एकादशी के व्रत की क्या कथा है , उसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है ? ” भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- ” हे अर्जुन ! माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं इस एकादशी के उपवास से मनुष्य भूत , प्रेत पिशाच आदि की योनि से छूट जाता है , अतः इस एकादशी के उपवास को विधि अनुसार करना चाहिए ।

अब मैं तुमसे जया एकादशी के व्रत की कथा कहता हूँ , ध्यानपूर्वक श्रवण करो- एक बार देवताओं के राजा इन्द्र नंदन वन में भ्रमण कर रहे थे । चारों तरफ किसी उत्सव का – सा माहौल था । गांधर्व गा रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थीं । वहीं पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या ने माल्यवान नामक गंधर्व को देखा और पर आसक्त होकर अपने हाव – भाव से उसे रिझाने का प्रयास करने लगी । माल्यवान भी उस गंधर्व कन्या पर आसक्त होकर अपने गायन का सुर – ताल भूल गया । इससे संगीत की लय टूट गई और संगीत का सारा आनंद बिगड़ गया । सभा में उपस्थित देवगणों को यह बहुत बुरा लगा । यह देखकर देवेंद्र भी रूष्ट हो गए । संगीत एक पवित्र साधना है । इस साधना को भ्रष्ट करना पाप है , अतः क्रोधवश इन्द्र ने पुष्पवती तथा माल्यवान को शाप दे दिया ‘ संगीत की साधना को अपवित्र करने वाले माल्यवान और पुष्पवती ! तुमने देवी सरस्वती का घोर अपमान किया है , अतः तुम्हें मृत्युलोक में जाना होगा । गुरुजनों की सभा में असंयम और लज्जाजनक प्रदर्शन करके तुमने गुरुजनों का भी अपमान किया है , इसलिए इन्द्रलोक में तुम्हारा रहना अब वर्जित है , अब तुम अधम पिशाच असंयमी का – सा जीवन बिताओगे ।

देवेंद्र का शाप सुनकर वे अत्यंत दुखी हुए और हिमालय पर्वत पर पिशाच योनि में दुःखपूर्वक जीवनयापन करने लगे । उन्हें गंध , रस , स्पर्श आदि का तनिक भी बोध नहीं था । वहीं उन्हें असहनीय दुःख सहने पड़ रहे थे । रात – दिन में उन्हें एक क्षण के लिए भी नींद नहीं आती थी । उस स्थान का वातावरण अत्यंत शीतल था , जिसके कारण उनके रोएं खड़े हो जाते थे , हाथ – पैर सुन्न पड़ जाते थे , दांत बजने लगते थे । एक दिन उस पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा – ‘ न मालूम हमने पिछले जन्म में कौन – से पाप किए हैं , जिसके कारण हमें इतनी दुःखदायी यह पिशाच योनि प्राप्त हुई है ? पिशाच योनि से नरक के दुःख सहना कहीं ज्यादा उत्तम है । इसी प्रकार के अनेक विचारों को कहते हुए अपने दिन व्यतीत करने लगे । भगवान की कृपा से एक बार माघ के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन इन दोनों ने कुछ भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म किया । उस दिन मात्र फल – फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और महान दुःख के साथ पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम भी करने लगे । उस दिन सूर्य भगवान अस्ताचल को जा रहे थे । वह रात इन दोनों ने एक – दूसरे से सटकर बड़ी कठिनता से काटी । दूसरे दिन प्रातः काल होते ही प्रभु की कृपा से इनकी पिशाच योनि से मुक्ति हो गई और पुनः अपनी अत्यंत सुंदर अप्सरा और गंधर्व की देह धारण करके तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत होकर दोनों स्वर्ग लोक को चले गए । उस समय आकाश में देवगण तथा गंधर्व इनकी स्तुति करने लगे नागलोक में जाकर इन दोनों ने देवेंद्र को दण्डवत् किया । देवेंद्र को भी उन्हें उनके रूप में देखकर महान विस्मय हुआ और उन्होंने पूछा- ‘ तुम्हें पिशाच योनि से किस प्रकार मुक्ति मिली , उसका पूरा वृत्तांत मुझे बताओ ।


‘ देवेंद्र की बात सुन माल्यवान ने कहा- ‘ हे देवताओं के राजा इन्द्र ! श्रीहरि की कृपा तथा जया एकादशी के व्रत के पुण्य से हमें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है । इन्द्र ने कहा- ‘ हे माल्यवान ! जया एकादशी व्रत करने तथा भगवान श्रीहरि की कृपा से तुम लोग पिशाच योनि को छोड़कर पवित्र हो गए हो , इसलिए हम लोगों के लिए भी वंदनीय हो गए हो , क्योंकि शिव तथा विष्णु – भक्त हम देवताओं के वंदना करने योग्य हैं , अतः आप दोनों धन्य हैं । अब आप प्रसन्नतापूर्वक देवलोक में निवास कर सकते हैं । ‘ हे अर्जुन ! इस जया एकादशी के उपवास से कुयोनि से सहज ही मुक्ति मिल जाती है । जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत कर लेता है , उसने मानो सभी तप , यज्ञ , दान कर लिए हैं । जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक जया एकादशी का व्रत करते हैं , वे अवश्य ही सहस्र वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं । “

एकादशी व्रत पूजन विधि

प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें। व्रत का संकल्प लें और फिर विष्णु जी की आराधना करें। भगवान विष्ण़ु को पीले फूल अर्पित करें। घी में हल्दी मिलाकर भगवान विष्ण़ु का दीपक करें। पीपल के पत्ते पर दूध और केसर से बनी मिठाई रखकर भगवान को चढ़ाएं।जया एकादशी की शाम तुलसी के पौधे के सामने दीपक जलाएं।भगवान विष्णु को केले चढ़ाएं और गरीबों को भी केले बांट दें। भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मी का पूजन करें और गोमती चक्र और पीली कौड़ी भी पूजा में रखें।