कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध | कन्या भ्रूण हत्या पर संपूर्ण निबंध

निबंधकन्या भ्रूण हत्या पर निबंध | कन्या भ्रूण हत्या पर संपूर्ण निबंध

प्रस्तावना

भारतीय समाज अनेक कुरीतियों से ग्रस्त रहा है। यहाँ बाल विवाह, अनमेल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, मृत्यु भोज आदि अनेक कुरीतियाँ प्रचलित रहे। हैं, लेकिन वर्तमान में प्रचलित कन्या भ्रूण हत्या की प्रथा एक जघन्य अपराध है, महापाय है, मानवता के मस्तक पर भारी कलंक है। इस कुप्रथा ने स्त्री-पुरुष के समानुपात को गड़बड़ा दिया है। 2011 की जनगणना से संकेत मिलता है कि छह साल तक के बच्चों के अनुपात में लड़कियों की संख्या लगातार कम हो रही है। प्रति हजार लड़कों में लड़कियों की संख्या 914 रह गई है। देश के कई बड़े राज्यों महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश आदि में यह अनुपात 914 से भी कम है। स्त्री-पुरुषों के लिंगानुपात में आई इस भारी गिरावट के कारण भविष्य में नारी उत्पीड़न, यौन शोषण और बलात्कार को घटनाओं में वृद्धि होने की आशंका बढ़ गई है। वर्तमान में ही इसके अनेक उदाहरण मिलने लगे हैं, मिल रहे हैं, यह चिन्तनीय है।

कन्या भ्रूण हत्या के कारण प्राचीन भारत में कन्या भ्रूण हत्या अथवा कन्या वध का कोई उदाहरण नहीं मिलता, लेकिन मध्यकाल में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत की पश्चिमोत्तर सीमा से प्रवेश करके पूरे देश को रौंद दिया। ये आततायी जीत के नशे में लूटपाट करते पुरुषों को गुलाम बनाकर साथ ले जाते, स्त्रियों का शील भंग करते और बच्चों को मारपीट कर उनका धर्म परिवर्तित कर देते थे। जिन स्त्रियों या कन्याओं को भ्रष्ट और अपमानित किया जाता, समाज उनकी सुरक्षा करने के बजाय उन्हें बहिष्कृत करता या आत्महत्या के लिए विवश कर देता था। सुरक्षा और संरक्षण के अभाव में स्त्रियाँ लड़कों को जन्म देना एवं लड़कियों की गर्भ में ही हत्या कर देना उचित मानने लगीं। हमारा समाज पुरुष प्रधान है। बेटी के विवाह में अन्य खर्चों के साथ-साथ दहेज भी देना पड़ता है। वर्तमान में सोनोग्राफी मशीनों की सहायता से गर्भवती महिला का भ्रूण परीक्षण करवाकर भ्रूण हत्या के द्वारा कन्या के जन्म को पहले ही रोक दिया जाता है।

कन्या भ्रूण हत्या के दुष्परिणाम कन्या भ्रूण हत्या का दुष्परिणाम यह हुआ कि – हमारे देश में पुरुष और स्त्री के लिंगानुपात में भारी असमानता आ गई। 2001 की जनगणना में जहाँ छ: वर्ष की आयु के लड़कों और लड़कियों में 1000 : 927 था वह 2011 की जनगणना में 1000 914 ही रह गया। राजस्थान में 2001 की जनगणना में जहाँ यह असमानता 1000 909 थी, वहीं 2011 में 1000 883 रह गई। सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च 2011 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में पिछले तीन दशकों में एक करोड़ बीस लाख बच्चियों को गर्भ में लिंग का पता लगवाकर मार दिया गया। सोचिए

यदि यही स्थिति रही तो भविष्य में हमारे समाज का क्या होगा ? लड़का और लड़की दोनों अपने माता-पिता की आँखों के तारे हैं। उनको समान प्यार, संरक्षण और विकास का अवसर मिलना चाहिए।

कन्या भ्रूण हत्या और कानून-भारत सरकार ने प्रसव पूर्व निदान तकनीकी अधिनियम (पी.एन.टी.डी.) के द्वारा सोनोग्राफी मशीनों से लिंग ज्ञान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया है, फिर भी समाज में लोभी चिकित्सकों और कन्याओं के दुश्मन माँ-बाप की कमी नहीं है, जो भारी राशि खर्च करके गैर-कानूनी ढंग से भ्रूण का लिंग परीक्षण करवाने से बाज नहीं आते।

कन्या भ्रूण हत्या के निषेधार्थ उपाय-संसार के सभी धर्म, पंथ और सम्प्रदाय – जीव-हत्या विशेषकर कन्या भ्रूण हत्या के पक्षधर नहीं हैं। जहाँ सरकार ने पी. एन.टी.डी. कानून के अन्तर्गत कन्या भ्रूण हत्या को दण्डनीय अपराध माना है। साथ ही नारी सशक्तीकरण, बालिका निःशुल्क, शिक्षा, पैतृक उत्तराधिकार, समानता का अधिकार प्रदान कर नारियों को आगे लाने का प्रयत्न किया है। साथ ही दहेज लेने व देने को भी दण्डनीय अपराध घोषित किया है। यदि भारतीय समाज में कन्या जन्म को मंगलकारी माना जाए, उसे घर की लक्ष्मी व सरस्वती मानकर उसका लालन-पालन किया जाए तो कन्या भ्रूण हत्या पर स्वत: ही प्रतिबंध लग जाएगा।

अभिनेता और निर्माता आमिर खान ने ‘सत्यमेव जयते’ धारावाहिक की प्रथम कड़ी में कन्या भ्रूण हत्या से संबंधित समस्या को बड़ी गंभीरता से उठाते हुए उसके कारणों पर प्रकाश डाला था, उसके दुष्परिणामों की ओर देशवासियों का ध्यान आकर्षित किया था, जिससे देश की कई राज्य सरकारों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ था।

उपसंहार

यह हम सभी जानते हैं कि नारी और पुरुष के सामंजस्यपूर्ण सहयोग और सद्भाव से ही समाज का विकास संभव है। स्त्री के अभाव में पुरुष एक पंख का पक्षी है, फिर क्या वह एक पंख से उड़ान भर पाएगा? ऐसे में यदि कन्या भ्रूण हत्या होती है, तो उसका दोषी कौन है ? अन्त में यही कहना उचित होगा कि कन्या भ्रूण हत्या एक अभिशाप है, पाप है, जघन्य अपराध है और इस पाप के जिम्मेदार आप हम सब हैं।