Homeपोराणिक कहानियाहोलिका दहन की कहानी।holika dahan ki kahani.

होलिका दहन की कहानी।holika dahan ki kahani.

होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत के त्योहार के रूप में मनाया जाता है और होलिका दहन की कहानी सुनते है। सनातन धर्म में होली का पर्व का अपना एक विशेष महत्व है होली का पर्व फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है होली 2 दिनों तक मनाई जाती है इस दिन लोग आपस मे दुश्मनी को भूलाकर आपस में गले मिलते हैं तथा एक दूसरे को रंग व गुलाल लगाते हैं।

होली का पर्व भाईचारे का पर्व है इस दिन लोग बुरा नहीं मानते हैं। होली के लिए एक कहावत भी प्रसिद्ध है कि “बुरा न मानो होली है”। होली मुख्यतः दो दिनों का पर्व होता है लेकिन होली की तैयारियां होलाष्टक लगने के साथ ही शुरू हो जाती हैं। होलाष्टक होली से आठ दिन पहले लग जाते हैं और आठवें दिन होली मनाई जाती है। होली से एक रात पहले होलिका दहन किया जाता है यहां इस पर्व से जुड़ी होलिका दहन की कहानी दी गई है

होलिका दहन की कहानी।holika dahan ki kahani.

होलिका दहन की कहानी।holika dahan ki kahani.
होलिका दहन की कहानी।holika dahan ki kahani.

होलिका दहन की कहानी – पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्यकशिपु असुर जाति का अत्याचारी और निर्दयी राजा था। उसके अत्याचार के कारण वहां की प्रजा भी बहुत दुखी थी।

हिरण्यकशिपु को भगवान से वरदान मिला था की कि कोई नहीं मार सकता है। इसी के घमंड में अँधा होकर उसने स्वयं को भगवान मान लिया और अपनी प्रजा को भी अपनी पूजा करने के लिए विवश किया।

हिरण्यकशिपु के पुत्र का नाम प्रहलाद था। वहा भगवान् विष्णु का बहुत बड़ा उपासक था। प्रह्लाद अपने पिता द्वारा स्वय को भगवान मानने की बात का विरोध किया करता था, जिसके कारण हिरण्यकशिपु क्रोधित हो जाता था।

प्रहलाद अपने पिता को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए कहता और भगवान विष्णु की भक्ति करने के लिए बोलता था। मगर हिरण्यकशिपु को अहंकार और शक्ति का इतना घमंड हो गया की वह खुद को भगवान मानता था।

हिरण्यकशिपु को जब पता चला की उसका पुत्र प्रहलाद दिन रात भगवान् विष्णु की आरधना करता है। अपने पिता की नहीं तब उसे इतना क्रोध आया की उसने प्रहलाद को मरने के लिए कई षड्यंत्र रचे मगर वह असफल रहा। अंत में उसे अपनी बहन होलिका की याद आई।

होलिका को वरदान मिला था की वहा आग में नहीं जल सकती है। इसी का फायदा उठा कर उसने प्रहलाद को आग में जलने की चाल चली और अपनी बहन के पास गया और उसको बोला की तुम प्रहलाद गोद में लेकर आग में बैठ जाना।

तब होलिका हिरण्यकशिपु के कहे अनुसार प्रहलाद को गोद में लेकर लकडियो में ढेर पर बैठ गयी। मगर प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था तो उसे भला क्या हो सकता था। उल्टा होलिका अपने वरदान में मिली आग में ही जल कर राख हो गयी और भगवान् विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद को बचा लिया। इसी घटना को हम सब होली के दिन यानि होलिका दहन के रूप में मनाते है।

इसके बाद भगवान् विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का भी अंत कर उसके आतंक से सबको मुक्त किया और हिरण्यकशिपु को उसके बुरे कर्मो की सजा मिली। इस तरह धर्म की अधर्म पर विजय हुई।

यह पढे – होली पर निबंध

होलिका दहन की कहानी।holika dahan ki kahani.

होलिका दहन की कहानी।holika dahan ki kahani.
Holika Dahan katha in Hindi

होली पर राधा कृष्ण से जुड़ी होलिका दहन की कहानी (holi ki kahani)

होली का पर्व को रंगो के त्यौहार के रूप में श्री कृष्ण और राधा के प्रेम की यादों के रूप में मनाया जाता है मान्यताएं हैं कि बचपन में जब श्री कृष्ण छोटे थे तो उन्होंने यशोदा से कहा कि वह राधा के समान गोरे क्यों नहीं है तब माता ने मजाक में ही कहा कि यदि तुम राधा के रंग लगाते हो तो वह भी तुम्हारी तरह ही हो जाएगी।

तब श्रीकृष्ण जी ने होली के दिन राधा जी को और गोपियों को रंग लगाया तभी से होली को रंगो के त्योहार के रूप में जाना जाने लगा। राधा कृष्ण के प्रेम से जुड़े स्थान बरसाना व मथुरा की होली विश्व प्रसिद्ध है।

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