अरुंधति व्रत

भारतीय त्यौहारअरुंधति व्रत

अरुंधति महर्षि वशिष्ठ की पत्नी थी। अरुंधति ब्रह्माजी के मानस पुत्री संध्या थी जो अपने तपो बल के कारण महर्षि वशिष्ठ की पत्नी बनी। अरुंधति भारतवर्ष की महानतम स्त्रियों में से एक थी। अरुंधति के नाम पर एक तारे का नाम भी रखा गया है।

अरुंधति व्रत का महत्व

यह व्रत चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा से प्रारंभ होता है और चैत्र शुक्ल तृतीया को समाप्त होता है स्त्रियों के चरित्र उत्थान के लिए यह व्रत किया जाता हैं।
अरुंधति का व्रत रखकर नवविवाहित स्त्रियां आदर्श पत्नी बनने की कामना करती है।

अरुंधति व्रत की कथा


अरुंधति व्रत

एक बार ऋषि वशिष्ठ अपने सप्त ऋषि समूह वशिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, कश्यप, गौतम, जमदग्नि के साथ हिमालय पर बारह वर्ष के लिए तपस्या करने के लिए  गए। ऋषि वशिष्ठ अपनी पत्नी अरुंधति को जंगल में आश्रम में ही छोड़कर चले गए।
वशिष्ट के हिमालय पर जाने के बाद जंगल में 12 वर्षों के लिए भयंकर अकाल पड़ा।
अरुंधति के पास अकाल की वजह से कुछ भी खाने को नहीं रहा। अरुंधति भगवान शिव की भक्ति करती थी वह भगवान शिव की तपस्या करने लगी एक दिन भगवान शिव ने अरुंधति की परीक्षा लेने की सोची।
और एक ब्राह्मण का वेश धारण करके अरुंधति के पास आए और कहां “हे देवी! मुझे बहुत भूख लगी है कृपया कुछ खाने को दीजिए”।
अरुंधति के पास ब्राह्मण को देने के लिए कुछ भी नहीं था ।अरुंधति ने कहा कि “है ब्राह्मण देव मेरे पास आपको खाने को  देने के लिए बदरी के बीज के अलावा कुछ भी नहीं है”।
बूढ़े ब्राह्मण के भेष में भगवान शिव ने कहा कि मेरे लिए इन बीजों को पका दो।
ब्राह्मण की बात सुनकर अरुंधति बीजों को पकाने लगी और बीजों को पकाते हुए धर्म की बातें करने लगी। और भगवान को धर्म की शिक्षा देने लगी।भगवान की शक्ति के कारण  बारह वर्ष बीत गए। और अकाल समाप्त हो गया तथा ऋषि वशिष्ठ सप्त ऋषि के साथ हिमालय से लौट आए।
भगवान शिव अरुंधति की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और अपने दिव्य रूप में दर्शन देकर सप्त ऋषियों से कहा कि आप ने बारह वर्ष तक हिमालय में जो तपस्या की है उससे भी उत्तम थी अरुंधति की तपस्या। यह कह कर भगवान शिव ने उस स्थान को शुद्ध किया और चले गए।