गणगौर की कहानी। gangaur ki kahani(katha).

भारतीय त्यौहारगणगौर की कहानी। gangaur ki kahani(katha).

गणगौर मुख्यतः राजस्थान में मनाया जाने वाला त्यौहार है जो चैत्र माह की तीज को आता है। गणगौर का पूजन होली के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से लेकर चैत्र शुक्ल तेज तक होता है। गणगौर के पूजन में लड़कियां और नवविवाहित महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य और ससुराल या पीहर की खुशी की कामना करती हैं। पूजन के साथ गणगौर की कथा (gangaur ki katha) सुनी जाती है। गणगौर की कथा सुनने वाले पर ईसर गणगौर की कृपा बनी रहती है।

गणगौर की कहानी गणगौर के दिन पूजन करने के पश्चात हाथ में आखे(गेहूं के दाने) लेकर सुनते हैं। गणगौर को अपनी सुविधा अनुसार पांच या सात कहानी सुन सकते हैं। इस दिन गणगौर की कहानी (गणगौर की कथा) सुनने के साथ विनायक जी और लपसी तपसी की कहानियां सुनी जाती हैं। यहां गणगौर के दिन सुने जाने वाली गणगौर की कहानियां दी गई है

गणगौर की कहानी। gangaur ki kahani.

गणगौर की कहानी – एक बार राजा ने जौ और चने बोये,और माली ने अपने घर मे दूब बोयी । राजा के जौ चने बढ़ते गए और माली की दूब घटती गई । एक दिन माली ने सोचा कि क्या बात है ? राजा के जौ चने तो बढ़ते जा रहे हैं और मेरी दूब क्यों घटती जा रही है । एक दिन माली छुपकर बैठ गया और देखने लगा कि क्या कारण है ? तब माली ने देखा कि कुंवारी लड़कियां आई और दूब तोड़कर ले गई तब माली उनके कपड़े छीनने लगा । और पूछने लगा कि तुम दूब क्यों ले जा रही हो ?

लड़कियां बोली हम सोलह दिन गणगौर पूजते हैं इसलिए पूजा के लिए दूब ले जा रहे हैं। सो हमारे कपड़े दे दो । सौलह दिन बाद गणगौर विदा होगी जिस दिन हम तुम्हें लापसी ,हलवा , घेवर , मिठाई आदि लाकर देंगे । फिर उसने सबके कपड़े वापस दे दिए । जब सौलह दिन पूरे हुए तब लड़कियों ने लापसी , हलवा आदि सामग्री मालन को लाकर दी । बाहर से मालन का बेटा आया और बोला माँ मुझे बहुत भूख लगी है । मालन बोली कि बेटा आज तो लड़कियां बहुत सारा खाना देकर गयी है । रसोई में रखा है ।

बेटे से रसोई खुली नहीं , तब माँ ने आकर चिन्टी अंगूली से छींटा दिया तो रसोई खुल गई । अंदर देखा तो ईसर गणगौर बैठे थे। ईसरजी ने बहुत सुंदर वस्त्र पहने हुए थे और गोरा माता मांग सवार रही थी। रसोई में अन्न धन के भंडार भरे पड़े थे। माली, मालन और उनके बेटे को ईसर गणगौर जी के सुंदर दर्शन हुए। है गणगौर माता जिस प्रकार माली के परिवार को दर्शन दिया उसी प्रकार सबको दर्शन देना। ईसरजी जैसा भाग और गोरा जैसा सुहाग सबको देना। गणगौर की कहानी कहतां न सुनतां न और सारे परिवार को देना।

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गणगौर की कहानी (गणगौर की कथा) – शिव पार्वती

गणगौर की कहानीएक बार भगवान शिव व पावती जी कैलाश पर्वत से सृष्टि का भ्रमण करने के लिए उतरे । तो सबसे पहले उनको एक गाय मिली जो बहुत ही तड़प रही थी क्योंकि उसको बच्चा होने वाला था तो माता पार्वती को बहुत घबराहट हुई । उन्होंने भगवान से कहा कि मेरे तो आप गाँठ बाँध दो मैं ऐसे दुःख देख नहीं सकती । तब भगवान बोले अभी तो बहुत कुछ देखना है । तब दोनों आगे चले तो हथिनी परेशान हो रही थी । फिर आगे चलने पर देखा कि राजा के रजवाड़े से उल्टे निशान हो रहे थे तब माता गौरा ने भगवान से पूछा कि ये क्या हो रहा है ?

तब भगवान ने कहा कि राजा की रानी भी गर्भवती है और उसे प्रसव पीड़ा है तब गौरां जी ने जबरदस्ती भगवान के मना करने पर भी गांठ लगवा ली और कहने लगी कि मुझे कभी भी बच्चा नहीं चाहिये । तब आगे और सैर करने लगे । तब वापस आते समय क्या देखते हैं कि राजा के यहाँ शहनाई बाजे बज रहे हैं और खुशियां मनाई जा रही हैं , रानी बहुत खुश हैं । तब गौरा जी बोली जब रानी ही बहुत खुश है तो मुझे बेटा होवे तो मैं कितनी खुश होऊँ ? आप मेरी गाँठ कृपा करके खोल दें ।

तब भगवान ने मना कर दिया और आगे चले । तो हथिनी भी अपने बच्चे को प्यार से चाट रही थी और गाय भी बहुत खुश नजर आ रही थीं । तब गौरा ने भगवान से बहुत जिद की । फिर वे घूमते – घूमते कैलाश पर्वत पहुँचे ।

कुछ दिन बाद गणगौर का दिन आया । औरतें माता गौरा ( गणगौर ) की पूजा करने व अपने सुहाग को अमर रखने के लिए आई । तब उन्होंने सारा सुहाग पहले पहुँचने वाली औरतों को बांट दिया । तब भगवान बोले कि तुम्हारी पुजारिनें ब्राह्मणी व बनियानियां तो धीरे धीरे सज – धज कर अब आयेंगी और तुमने सारा सुहाग पहले ही बांट दिया । तब उनके आने पर गौरां जी ने ” नैनों में से सुरमा निकाला , मांग में से सिन्दूर निकाला , टीकी में से रोली निकाली और चिटली अंगुली से अमर सुहागिन होने के छींटे दिए ,और अमर सुहाग को बांटा । “

हे भगवान ! गणगौर माता की कहानी कहने वाले को , सुनने वाले को , हुँकारा भरने वाले को सभी को ईसर गणगौर की कृपा प्राप्त हो और सभी को अमर सुहागन रखें ।

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गणगौर की कथा। गणगौर की कहानी।- ईसर गणगौर

गणगौर की कहानी। gangaur ki kahani(katha).
गणगौर की कथा

गणगौर की कहानी – एक बार ईसरजी सौलह दिन गणगौर के हुए तो सब ससुराल गौरां जी को लेने पहुंचे । वहाँ उनकी माँ ने ( गौरां की माँ ) जितना भी खाना बनाया वो सब खाना ईसरजी ने गौरां की परीक्षा लेने के लिए जीम गए । तब माता गणगौर को भूख लगी और वे कहने लगी कि माँ घर में जो भी खाने को है वो ही मुझे दे दो तब देखा तो बथुए की दो पींडी व जल का लोटा मिला तो गौरां जी ने वो ही खा लिया और पानी पी लिया । तब ईसरजी विदाई के लिए जल्दी करने लगे ।

जब वे ससुराल से विदा हो लिए तब उन्हे रात को जंगल में विश्राम करना पड़ा । माता गौरां को भूख के कारण गहरी नींद आ गई । तब ईसरजी ने उनके पेट मे देखा तो बथुए की पींडी व जल का लोटा झूल रहा था । भगवान ईसरजी ने बाद में गौरांजी से पूछा कि आज तुमने क्या – क्या खाया ? तब माताजी बोली आपने खाया वही मैंने खाया । तब भगवान बोले कि तुम झूठ बोलती हो तुम्हारे पेट में तो बथुए की पींडी व जल का लोटा झूल रहा है ।

तब गौरा जी को क्रोध हुआ और वे बोली कि आज तो आपने औरत जात के पेट में ढकनी खोली है आइन्दा कभी भी मत खोलना जंवाई को खिला दे और बेटी को कुछ भी । आपने तो मेरी माँ की परीक्षा ले ही ली थी । इसी प्रकार दोनों कैलाश पर्वत पर पहुँचे ।

आशा है आपको गणगौर की कहानी (gangaur ki kahani) अथवा गणगौर की कथा (gangaur ki katha)पसंद आई होगी, धन्यवाद।

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