गणगौर, जानिए पूजन की विधि व गीत

भारतीय त्यौहारगणगौर, जानिए पूजन की विधि व गीत

गणगौर मुख्यतः राजस्थान में मनाया जाने वाला प्रमुख त्योहार है जो चैत्र शुक्ल तीज को मनाया जाता है

गणगौर का पूजन होली महापर्व के दूसरे दिन  चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से लेकर चैत्र शुक्ल तीज  तक मनाया जाता है इस दिन के बारे में कहा जाता  है कि  माता पार्वती होलिका के दूसरे दिन अपने पीहर जाती है पीहर  जाने के 8 दिन बाद भगवान शिव उन्हें लेने जाते हैं। तथा चैत्र शुक्ल तीज को माता गोरी को शिव जी के साथ विदा किया जाता है।
गणगौर की पूजन में लड़कियां वह नवविवाहिता महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य तथा अपने ससुराल वह पीहर की खुशी की कामना करती है तथा गणगौर से हर वर्ष फिर आने का आग्रह करती है।

पूजन विधि


गणगौर के दिन सुबह लड़कियां 8 पिंडिया होली की राख तथा 8 पिंडिया गोबर की बनाकर एक छोटी टोकरी में दूब बिछाकर उसमें रख देती है।
और एक लोटे में जल ,फूल तथा दूब लेकर “दूब ल्याने” का गीत गाती हुई आती है।

दूब लाने का गीत


“बाड़ी वाला बाड़ी खोल, बाड़ी की कीवाड़ी खोल, छोरिया आई दूब न, कूणी जी री बेटी हो, कूणी जी री पोती हो, काई तुम्हारा नाम है।
मैं ब्रह्मादास जी री बेटी हाँ, ईसरदास जी री बहना हाँ, रोवां म्हारो नाम है।”

बाड़ी वाली के बाड़ी खोल देने के बाद जमीन पर गोबर तथा पीली मिट्टी का चौका लगाती है और उस पर पिंडियो की टोकरी रख देती है। तथा दीवार पर  काजल व रोली की  16,16 टीकिया लगा देती है। तथा मेहंदी की भी 16 टीकिया लगाती है। पिंडियों पर काजल की टिकी लगाती है और फूल चढ़ाती है।
इसके बाद एक थाली में थोड़ा सा जल लेकर उसमें एक कोढ़ी, एक सुपारी, एक पैसा तथा एक चांदी का छल्ला डालकर दूध से 16  छींटें लगाती है।
तथा उनको पिंडियों के लगाकर अपनी आंखों से लगाती है। शीतला सप्तमी तक 8 दिन तक ऐसे ही पूजा करती है।
बासेड़ा  या शीतला सप्तमी के दिन गणगौर को कुम्हार से लेकर आती है या फिर स्वयं बनाती है तथा एक टोकरी में गणगौर व उनके पति इसर जी को रखती है, और उन्हें कपड़े पहनाती है। तथा मिट्टी के कलश में मिट्टी भरकर उसमें जो डाल देती है और “मिट्टी लाने”  का गीत गाती है।

मिट्टी लाने का गीत

“ईसरदास बीरा लीलड़ी पलाण के टीकी ल्याज्यो जड़ाव की जी। कनीराम बीरा लीलड़ी पलाण के टिकी ल्याज्यों जड़ाव की जी। टिकी लगावे हेमाजल जी की धीये, के ब्रह्मा दास जी की कुल बहु जी।”

इसके बाद दिन में पानी लाकर गणगौर को पानी पिलाने पर पानी पिलाने का गीत गाती है

गणगौर को पानी पिलाने का गीत

“म्हारी गौर तसाई जी राज, घाटारी मुकुटै करो
ब्रह्मादास जी रा ईसरदास जी रो राज,घाटारी मुकुटै करो।
ब्रह्मादास जी रा  कानीराम ओ राज,घाटारी मुकुटै करो
म्हारी गौरी ने पानीङ़ो पिलाओ,घाटारी मुकुटै करो
थोड़ा पानीङ़ो  पावे जी राज,,घाटारी मुकुटै करो”

इस गीत के बाद गणगौर को रख देते हैं तथा दूध से उसको दातुन करवाते हैं। इसके बाद जल चढ़ाते हैं, गणगौर के काजल लगाते हैं तथा टीका लगाते हैं व फूल की माला पहनाते हैं।
तथा दूब लाने के गीत के साथ झंवारे का गीत भी गाती है

झंवारे के गीत

“म्हारा हयां ए झंवारा एक, गेहूंला सिर से बंध्या।
गौर ईसरदास का बोया एक, बहू गौरल सींच लिया
गौर कानीराम का बोया एक, बहू लाडले सींच लिया
भाभी सींच न जाने एक, जो पीला पड़ गया ए
बाई  जी दो धड़ सींचा एक, लांबा तीखा सर से बंध्या
म्हारो सरस पटेलो एक, बाई रोवा पहन लियो
म्हारो दांता खेलो चुड़िलो एक,बाई रोवा पहन लियो
म्हारो दूध भरयो कटोरो एक, बाई रोवा ओढ़ ली
म्हारो दूध भरयो कटोरो एक, बाई रेवा पी लियो
बोरो ये अजवाल एक, हों जो बूढ़ा डोकरा
भाभी सेजां में सोवो एक, पीली पाटया राज करो
म्हारा हर्या एक झवारा एक, गेहूंला सिर से बंध्या।”

तथा अंतिम में आरती गाती है तथा छींटे देकर  एलखेल का गीत गाती हुई गणगौर माता की कहानी सुनाती है और दूध चढ़ाती है।गणगौर, जानिए पूजन की विधि व गीतधनी स्त्रियों को देखकर भगवान शिव पार्वती से कहते हैं कि आपने सारा सुहाग रस तो निर्धन  स्त्रियों को ही दे दिया अब इन्हें क्या दोगी? भगवान की बात सुनकर मां गौरी ने कहा हे प्रभु मैंने उन्हें ऊपरी पदार्थों से निर्मित रस दिया है
तो निर्धन स्त्रियों का सुहाग धोती सही रहेगा तथा इन धनी स्त्रियों को मैं अपनी अंगुली के रक्त से सुहाग दूंगी तो यह भी मेरी तरह सुहागन हो जाएगी जब धनी स्त्रियों ने भगवान शिव व मां गौरी की पूजा पूरी की तो माता गोरी ने उन पर अपनी अंगुली से रक्त को छिड़क दिया और कहा कि अब तुम्हें इन वस्त्र आभूषण को त्याग देना चाहिए
तथा तुम सबको सारी मोह माया को छोड़कर तन,मन और धन से अपने पति की सेवा करनी चाहिए। इत्र तुम सब अखंड सौभाग्यवती हो जाओगी। इतना कहकर मां गौरी ने भगवान शिव से आज्ञा लेकर नदी में स्नान किया स्नान करने के बाद मिट्टी से भगवान शिव की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा की, और भोग लगाया इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुये और माता पार्वती को यह वरदान दिया कि आज के दिन जो भी स्त्रियां तुम्हारी पूजा करेगी उन्हें अखंड सौभाग्य प्राप्त होगा। इसके बाद भगवान शिव अंतर्ध्यान हो गए।
इन सब में पार्वती जी को बहुत ज्यादा समय लग गया था जब वापस उस स्थान पर आई जहां पर वो भगवान शंकर और नारद मुनि को छोड़ कर गई थी
तो शंकर भगवान ने उनके देर से आने का कारण पूछा तो माता पार्वती ने कहा कि मेरे भाई और भाभी वहां मिल गए थे और भाई भाभी ने दूध और भात खाने व ठहरने  का आग्रह किया।