गुड़ी पड़वा त्यौहार, इसी दिन से शुरू होता है शुभ मुहूर्त

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चैत्र शुक्ल एकम को गुड़ी पड़वा का त्योहार मनाया जाता है। यह हिंदू संस्कृति के अनुसार नव वर्ष का प्रथम दिवस है। और चैत्र नवरात्रों का प्रारंभ भी होता है। इस दिन भगवान को पूरन पोली का भोग लगाया जाता है। नीम के पत्ते,काली मिर्च, सूठ, धनिया, शक्कर या मिश्री मिलाकर प्रसाद के रूप में सबको वितरित करते हैं और स्वयं भी खाते है।

आरोग्य शास्त्र के अनुसार यह रीति महत्वपूर्ण है क्योंकि नीम,काली मिर्च, सूंठ आरोग्य प्रदान करने वाले औषधीय गुणों वाले पदार्थ हैं।
यह दिन शुभ दिन है अतः प्रत्येक शुभ कार्य का प्रारंभ इसी दिन से किया जाता है। चैत्र  दशहरे के दिन सभी श्रद्धालु माता जी की पूजा करके धोक देते हैं ।यह दिन साढ़े तीन दिन के  मुहूर्त के अंदर का दिन माना जाता है।

गुड़ी का अर्थ विजय पताका होता है। ऐसा कहा जाता है की गुड़ी पड़वा के दिन ही शालीवाहन ने मिट्टी के सैनिकों से अपने शत्रुओं का संहार किया था और विजय प्राप्त की थी। इसी विजय के उपलक्ष में उन्होंने  इसी दिन शक संवत प्रारंभ किया था।

गुड़ी पड़वा को अलग अलग राज्यों में अलग अलग नामों से भी जाना जाता हैं
युग और आदि शब्द के मेल से बने युगादि शब्द के कारण

आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में उगादि नाम से जाना जाता है
महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता है। और मराठी लोग नए साल की शुरुआत मानते हुए नई फसल की पूजा भी करते हैं।

गुड़ी पड़वा का महत्व

गुड़ी पड़वा त्यौहार, इसी दिन से शुरू होता है शुभ मुहूर्त
  • इसी दिन से शुभ कार्य का प्रारंभ होता है इसलिए इस दिन मकान वाहन और कोई भी वस्तु खरीदना या कोई काम शुरू करना शुभ माना जाता है।
  • गुड़ी पड़वा के दिन नीम की पत्तियों का सेवन उत्तम माना जाता है इनके सेवन से खून साफ होता है और शरीर निरोग बनता है।
  • ऐसा माना जाता है कि गुड़ी पड़वा के दिन ही परम पिता ब्रह्मा ने हमारी पृथ्वी का सृजन किया था।
  • गुड़ी पड़वा के दिन ही भगवान श्री राम द्वारा रावण का वध करके अयोध्या आगमन हुआ था।

  • गुड़ी पड़वा के दिन पूजन करने से घर से बुरे प्रभाव दूर होते हैं और सुख समृद्धि आती है।
गुड़ी पड़वा का त्यौहार मराठी में बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि इसी दिन शिवाजी ने युद्ध जीतने के बाद यह त्यौहार मनाया था तब से मराठी लोग इसका अनुसरण करते हैं।
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