बिंदायक जी की कहानी/ बिंदायक जी की कथा।bindayak ji ki kahani.

भारतीय त्यौहारबिंदायक जी की कहानी/ बिंदायक जी की कथा।bindayak ji ki kahani.

सभी व्रत व त्यौहार मैं व्रत की कथा सुनने के साथ-साथ बिंदायक जी की कहानी सुनी जाती है। इससे व्रत करने का पूर्ण लाभ प्राप्त होता है और साथ-साथ गणेश जी की कृपा भी बनी रहती हैं। हम यहां आपके लिए बिंदायक जी की तीन कहानियां लेकर आए हैं आप इनमें से कोई भी कथा व्रत के दिन पढ़ सकते हैं।

बिंदायक जी की कहानी – 1 . bindayak ji ki kahani (katha)

भगवान विष्णु माता लक्ष्मी जी से विवाह के लिए जाने लगे तब सारे देवी देवताओं को बारात में जाने के लिए बुलाया गया। जब सभी देवता गण जाने लगे तो उन्होंने बोला कि गणेश जी को तो नहीं लेकर जाएंगे क्योंकि गणेश जी बहुत ज्यादा खाते हैं और दुन्द दुन्दालो, सुन्ड सुन्डालो, उखला सा पांव, छाजला सा कान, मस्तक मोटो-लाजे, भीम कुमारी व मोटे मस्तक वाले हैं। इनको ले जाकर क्या करेंगे इसलिए गणेश जी को तो यहीं पर घर की रखवाली के लिए छोड़कर जाएंगे। ऐसा कह कर गणेश जी को छोड़कर सभी बरात में चले गए।

वहां पर नारद जी आकर गणेश जी को कहने लगे कि हे बिंनायक जी आपका तो बहुत अपमान कर दिया। आपके जाने से बारात बुरी लगती इस कारण आपको यहीं पर छोड़ कर चले गए। तब विनायक जी ने अपने वाहन मूषक को आज्ञा दी कि संपूर्ण पृथ्वी को खोदकर खोखली कर दो। आज्ञा पाकर मूषक ने खोदकर पूरी धरती को खोखला कर दिया। खोखली होने से भगवान विष्णु के रथ का पहिया धरती में धंस गया। तब हर कोई रथ के पहिए को निकालने की कोशिश करने लगा लेकिन रथ का पहिया नहीं निकला।

रथ का पहिया निकालने के लिए खाती को बुलाया गया खाती ने वहां आकर सारा दृश्य देखा। उसके बाद रथ के पहिए को हाथ लगा कर कहां जय गजानंद गणेश जी महाराज की जय । इतना कहते ही रथ का पहिया निकल गया। सब आश्चर्यचकित होकर सोचने लगे कि तुमने गणेश जी का नाम क्यों लिया तो खाती ने बोला कि जब तक गजानंद गणेश जी महाराज का नाम नहीं लिया जाता तब तक कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है। जब भी गणेश जी को सच्चे मन से सुमिरन करता है और याद करता है उसके सारे बिगड़े काम बन जाते हैं।

तब सब ने सोचा कि हम तो गणेश जी को लेकर ही नहीं आए। सबको अपनी गलती का एहसास हुआ और एक जने को भेजकर गणेश जी को बुलाया गया और माफी मांगी गई। पहले गणेश जी का विवाह रिद्धि सिद्धि से करवाया गया और फिर विष्णु भगवान का विवाह लक्ष्मी जी से हुआ। उसके बाद सभी देवताओं में प्रसन्नता और हर्षोल्लास छा गया।

हे बिंदायक जी महाराज जैसा भगवान का कार्य सिद्ध किया वैसा सबका करना। बिंदायक जी की कहानी कहने वाले का, बिंदायक जी कहानी सुनने वाले का, हुंकार भरने वाले का और सभी का कार्य सिद्ध करना।

बोलो बिंदायक जी महाराज की जय। आपको बिंदायक जी महाराज की कहानी (bindayak ji maharaj ki kahani) अच्छी लगी होगी। तो आइए जानते हैं बाबा बिंदायक की कहानी(baba bindayak ki kahani)

गणेश जी की खीर वाली कहानी।

बिंदायक जी की कहानी – 2. (bindayak ji ki kahani).बिंदायक जी की कथा (bindayak ji ki katha)

एक ब्राह्मण था जो नित्य प्रतिदिन सुबह उठकर गंगा जी स्नान के लिए जाता और आकर बिंदायक जी की पूजा करता और बिंदायक जी की कहानी(bindayak ji ki kahani) सुनता था। उसकी पत्नी को पूजा करना अच्छा नहीं लगता था और वह गुस्सा हो जाती थी कहती थी कि सुबह पहले पूजा करने के लिए बैठ जाते हो मैं झाड़ू निकालती हूं घर का काम करती हूं तुम्हें कोई काम नहीं है क्या।

ब्राह्मण उसकी बात को सुनता ही नहीं था। एक दिन ब्राह्मण गंगा जी नहाने के लिए चला गया और पीछे से ब्राह्मणी ने बिंदायक जी को छुपा कर रख दिया। वापस आकर ब्राह्मण ने कहा कि बिंदायक जी की मूर्ति कहां गई तो ब्राह्मणी बोली कि मुझे तो नहीं पता कहां गई। ब्राह्मण ने खाना नहीं खाया और पानी भी नहीं पिया राम ने कहा कि जब तक मैं बिंदायक जी की पूजा नहीं कर लेता तब तक आना जल का ग्रहण नहीं कर सकता। मैं तो बिंदायक जी की पूजा करने के बाद ही अन्न जल ग्रहण करूंगा।

ब्राह्मणी ने ब्राह्मण को बहुत समझाया कि खाना खा लो लेकिन उसने नहीं खाया। दोनों को लड़ते झगड़ते देखकर विनायक जी की मूर्ति हंसने लगी तब ब्राह्मणी गुस्से में आकर बोली की मूर्ति वहां रखी है। उसके बाद ब्राह्मण ने विनायक जी की पूजा अर्चना की। तब अचानक ही विनायक जी की मूर्ति बोल उठी कि तुझे मेरी सेवा करते हुए बहुत दिन हो गए। कुछ मांग।

ब्राह्मण बोला कि अन्न मांगू, धन मांगू, जितना दुनिया में सुख है वह सब मांगू। तब विनायक जी ने सारा सुख धन अन्न सब ब्राह्मण को दे दिया। ब्राह्मण मूर्ति को मंदिर में रखकर पूजा अर्चना करने लगा ब्राह्मणी को इतना अन्न धन मिलने से उसकी भी पूजा करने की श्रद्धा जाग उठी और वह भी ब्राह्मण को बोलकर मूर्ति घर में रखवाई और खूब प्रेम से पूजा करने लगी।

हे बिंदायक जी महाराज जैसा ब्राह्मण को सुख दिया वैसा सबको देना बिंदायक जी की कहानी कहने वाले को, बिंदायक जी की कहानी सुनने वाले को और हुंकार भरने वाले को और पूरे परिवार को देना।

तो बोलो गजानंद गणेश जी महाराज की जय। बिंदायक जी महाराज की जय।

आपको बिंदायक जी की कहानी(bindayak ji ki kahani) अच्छी लगी होगी तो आइए जानते हैं बिंदायक जी की अगली कहानी।bindayak ji ki katha

जानिए गंगा मैया की संपूर्ण कथा।

बिंदायक जी की कहानी – 3. bindayak ji ki kahani (katha).

दो देवरानी और जेठानी थी। देवरानी के पास बहुत धन था लेकिन जेठानी गरीब थी। जेठानी गणेश जी की बहुत आराधना करती थी वह अपनी देवरानी के घर आटा पीसने जाती थी। जिस कपड़े से वह आटा शांति थी उस कपड़े को घर लाकर पानी में घोलकर अपने पति को पिला देती थी।

एक दिन देवरानी के लड़के ने देख लिया और अपनी मां से बोला कि मां ताई यहां से आटे का कपड़ा ले जाकर ताऊ जी को घोलकर पिला देती है। देवरानी बात सुनकर बहुत गुस्सा हुई और जेठानी को बोली कि मेरे घर से आटा छानने के बाद कपड़ा यहीं पर रखकर हाथ धोकर जाए। वह ऐसा ही करने लगी।

लेकिन जब वह घर जाती तो उसका पति बोलता कि मुझे आटा घोल कर दे बहुत भूख लग रही है। जेठानी ने बोला कि आज उसने आटा छानने का कपड़ा रख लिया। तब उसका पति गुस्से में आकर उसको मारने लगा उस रात वह गणेश जी गणेश जी करती सो गई। गणेश जी आए और उन्होंने पूछा कि क्यों सो रही हैं वह बोली कि मेरी देवरानी के आटा छानने को कपड़ों लाकर मेरे पति को घोलकर पिला दी थी आज उसने कपड़ा रख लिया। मैं पिला नहीं सकी इसलिए मेरे पति ने मुझे मारा।

गणेश जी ने कहा कि मैं घर घर से तिलकुट खा कर आया हूं इसलिए मुझे शौच जाना है कहां पर जाऊं। उसने कहा कि महाराज बहुत जगह पड़ी है कहीं पर भी चले जाओ। गणेश जी शौच कर के वहां से चले गए। थोड़ी देर बाद जब उसने उठकर देखा कि सारा घर तो हीरो से जगमग आ रहा है। वह धन को इकट्ठा करने लगी तो देवरानी के घर जाने में देर हो गई।

देवरानी ने लड़के को भेजा कि देखकर आओ आज ताई क्यों नहीं आई। लड़के ने आकर देखा कि ताई के घर में तो बहुत सारा धन हो रहा है उसने जल्दी से जाकर अपनी मां को बताया। देवरानी दौड़ी दौड़ी आई और पूछा कि तेरे यहां इतना धन कहां से आया तब जेठानी ने सारी बात बता दी।

इतनी सुनकर देवरानी घर पर आई और अपने पति से बोली कि मुझे भी लकड़ी से मारो। जेठानी के पति ने उसे लकड़ी से मारा था उसके घर बहुत धन हो गया। उसका पति बोला कि तू धन की भूखी क्यों मार खाती है। लेकिन वह नहीं मानी उसके पति ने उसे खूब मारा वह सारा मकान खाली करके गणेश जी का नाम लेकर सो गई गणेश जी आए और बोले कि मैं घर घर से तिलकुट खा कर आया हूं इसलिए मुझे सोच जाना है कहां पर जाऊं।

तब वह बोली कि महाराज मेरे तो बहुत बड़ा मकान है कहीं पर भी चले जाओ। गणेश जी सोच कर के वहां से अंतर्ध्यान हो गए। थोड़ी देर बाद वह उठकर देखी तो उसने देखा कि घर में बहुत सारा कूड़ा कचरा रखा हुआ है। यह देखकर वह बोली की महाराज आपने तो मेरे साथ कपट किया है। जेठानी को तो इतना सारा धन दे दिया और मुझे कूड़ा करकट दिया है।

गणेश जी वहां आए और बोले कि तू धन की भूखी मार खाई और वह धर्म की भूखी। देवरानी बोली कि महाराज यह सब कूड़ा कचरा समेटो। मुझे तो धन नहीं चाहिए तब गणेश जी ने कहा कि तेरे पास जितना धन है उसमें से आधा जिठानी को दे दे तब यह सब कूड़ा कचरा समेट लूंगा। देवरानी ने जब अपने धन में से आधा धन जेठानी को दिया तब गणेश जी ने अपनी सारी माया समेटी।

हे गजानंद गणेश जी महाराज देवरानी को दिया वैसा किसी को मत देना जेठानी को दिया वैसा सबको देना। विनायक जी की कहानी कहने वाले को, विनायक जी की कहानी सुनने वाले को, हुंकार देने वाले को और पूरे परिवार को देना।

तो बोलो गजानंद गणेश जी महाराज की जय। बिंदायक जी महाराज की जय।

आप सभी को बिंदायक जी की कहानी(bindayak ji ki kahani) पसंद आई होगी धन्यवाद। bindayak ji ki katha

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