Vaishakh ki chauth Mata ki kahani , वैशाख की चौथ की कहानी

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वैशाख संकटनाशक चौथ: शुक्रवार 30 अप्रैल 2021


एक बार भवानी उमा तथा उसका पुत्र श्री गणेश साथ साथ बैठे बातें कर रहे थे। तभी माता उमा ने पूछा है! वत्स गणेश वैशाखी चौथ का क्या विधि विधान है।

सो कहो?इस चौथ को संकटनाशक चौथ क्यों कहते हैं। तब भगवान श्री गणेश जी महाराज ने अपने श्री मुख से कहा कि जग जननी माता वैशाख कृष्ण चतुर्थी को होने वाले चौथ सर्व प्रकार के संकट हरने वाली है इसलिए इस चौथ को संकटनाशक चौथ कहते हैं ।इस दिन भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है।

वैशाख की चौथ की कहानी 

Vaishakh ki chauth Mata ki kahani

Vaishakh ki chauth Mata ki kahani , वैशाख की चौथ की कहानीकिसी गांव में एक विधवा माता और उसका पुत्र रहता था। वह गायों को चरा कर अपना पालन पोषण करता था। उसकी माता बारहमासी चौथ माता का व्रत करती थी। वह हर महीने की विनायक चौथ को चूरमे के पांच लड्डू बनाती थी। उनमें से एक चौथ माता का, एक गणेश जी का, एक गाय का निकाल कर दान करती,एक बेटे को खिलाती और एक स्वयं खाती।
जब वैशाख महीने की चौथ थी बेटा पड़ोसन के घर गया वहां चूरमा देखकर पूछने लगा तब वह बोली आज वैशाखी चौथ है,इसलिए मैंने चूरमा बनाया है।
तेरी मां तो हर चौथ को ही बहुत सारे लड्डू बनाती है पर तुझे केवल एक ही लड्डू खाने को देती है। ठंडी बासी रोटी की खाने को देती है। लड़का पड़ोसन की बातों के बहकावे में आ गया और अपनी माता से बोला मां तू तो चूरमा खाती है और मुझे सिर्फ एक लड्डू देती है। इसलिए तू अब चौथ माता का व्रत करना छोड़ दें। मां ने कहा बेटा में तो चौथ माता का व्रत है तेरी ही सुख शांति के लिए करती हूं।मैं यह व्रत नहीं छोड़ सकती हूं। यह सुनकर बेटा नाराज होकर विदेश जाने लगता है, मां बोली बेटा यदि तू मेरे से नाराज होकर विदेश जाना चाहता है तो यह माताजी की आखें अपने साथ ले जा। यदि तेरे  पर कोई संकट आए तो चौथ माता और विनायक जी का नाम लेकर इन्हें डाल देना। तेरा संकट दूर हो जाएगा। लड़का आखों को लेकर विदेश  चला गया। रास्ते में उसे एक खून से भरी हुई नदी मिली जिसे पार करना संभव था। लेकिन उस संकट की घड़ी में उसे अपने मां की याद आई और उसने एक आखा चौथ माता का नाम लेकर उस नदी में डाल दिया और कहा चौथ माता यदि तू सच्ची है और मेरी मां मेरे लिए ही तेरा व्रत करती है तो यह नदी दूध और पानी से भर जाए और मुझे रास्ता मिल जाए उसके ऐसा कहते रास्ता मिल गया। आगे चलने पर भयंकर जंगल से भी उसे इसी प्रकार आखे पूर कर गुजरना पड़ा। आगे चलकर एक नगर में पहुंचा उस राजा के यहां रोज एक मिट्टी के बर्तन का अलाव पकता था। वह अलाउ तब पकता  था जब उसमें एक आदमी की बलि दी जाती थी।
यानी एक आदमी को बर्तनों के साथ चुन दिया जाता था। उस लड़के ने वहां जाकर देखा एक बुढ़िया माई आटा पीसते जा रही थी और रोती जा रही थी। लड़के ने इसका कारण पूछा तब बुड़िया बोली कि आज मेरे इकलौते बेटे का इस अलाव में जाने का नंबर है। तब वह लड़का बोला है बुढ़िया माई तू मुझे जल्दी से खाना खिला दे तेरे पुत्र की जगह मैं जाऊंगा बुढ़िया माई ने मना करने पर भी वह नहीं माना और राजा का बुलावा आने पर अपना सामान बुढ़िया माई के घर छोड़कर चला गया। साथ में चौथ माता के आखे व एक जल का लोटा उस अलाव में अपने साथ रख लिया और चौथ माता का नाम लेकर बैठ गया। दूसरे दिन अलाव पक कर तैयार हो गया। लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ। प्रजा ने जाकर राजा से यह बात कही।
तब राजा स्वयं देखने आए अलाव में से बर्तन निकाले जाने लगे तो अंदर से आवाज आई धीरे-धीरे बर्तन उतारो अंदर में हूं। तभी राजा ने आवाज सुन कर कहा कि “तू अंदर कौन है कोई भूत प्रेत है या कोई देव”।
तब वह लड़का बोला “कल जिस लड़के को तुमने अलाव में चुना था मैं वही लड़का हूं।
लड़का बाहर आया। बाहर आने पर बुढ़िया माई व राजा के पूछने पर उसने कहा कि यह सब चमत्कार मेरी चौथ माता वह बिंदायक जी के व्रत का है। मेरी मां मेरी सलामती के लिए व्रत करती है उन्हीं के प्रताप से आज मेरा यह भयानक संकट दूर हुआ है। राजा को विश्वास नहीं हुआ। तब राजा ने दो घोड़े मंगाए एक पर स्वयं बैठा दूसरे को लड़के को बिठाकर उसके हाथ पैरों में जंजीर बांधी और कहा यदि तेरी चौथ माता सच्ची है तो यह जंजीर मेरे हाथ पैरों में आ जाएं।
लड़के ने चौथ माता का आखा पुरकर कहा है गणेश! जी महाराज आप ही मेरी रक्षा करना। इतना कहते ही भगवान की कृपा से वह जंजीरे खुलकर राजा के हाथ में जा गिरी। राजा रानी व प्रजा ने चौथ माता का चमत्कार अपनी आंखों से देखा। उसी दिन से वे सभी चौथ माता व विनायक जी के परम भक्त हो गए। राजा ने अपनी राजकुमारी का विवाह उस लड़के के साथ कर दिया और बहुत सारा धन वैभव देकर उसको विदा किया। अब वह दोनों वर-वधू अपने गांव पहुंचे तो लोगों ने जाकर बुढ़िया माई को बताया कि तेरा बेटा बहू को साथ लेकर आ रहा है। तब वह बोली अरे नहीं मेरे भाग्य में बहु बेटे का सुख कहां? वह ऐसा कह ही रही थी कि दोनों जने उसके पैरों में गिर गए और बेटा अपनी मां से माफी मांगने लगा और कहने लगा कि यह सब चौथ माता की ही कृपा है कि आज मैं तेरे सामने खड़ा हूं। उसके बाद उसने सारी नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सारी सुहागिने, बेटी की मां हो सके तो लड़कियां भी चौथ माता का व्रत करें और हो सके तो पूरी 12 महीने की चौथ करें l,नहीं तो चारों बड़ी चौथ करें ,नहीं तो दोतो अवश्य ही करें।
हे चौथ माता जैसा तुमने बुढ़िया माई और उसके बेटे को दिया वैसा सभी कहानी कहने और सुनने वाले को देना।

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