अजा एकादशी व्रत कथा। aja ekadashi vrat katha.

भाद्रपद मासअजा एकादशी व्रत कथा। aja ekadashi vrat katha.

यह भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है इसे अजा एकादशी या कृष्णैकादशी कहते हैं। इस दिन आजा एकादशी का व्रत किया जाता है और अजा एकादशी व्रत कथा सुनी जाती है। इस व्रत को करने से पूर्व जन्म की सभी बाधाएं दूर हो जाती है यह व्रत निराहार रहकर या अल्पाहार लेकर किया जाता है।

माना जाता है कि अजा एकादशी व्रत को विधिवत करके अजा एकादशी व्रत कथा सुनने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है और अंत में सद्गति को प्राप्त होता है तो आइए जानते हैं अजा एकादशी व्रत कथा या अजा एकादशी की कहानी(aja ekadashi ki kahani)”!

अजा एकादशी व्रत कथा। aja ekadashi vrat katha.

अजा एकादशी व्रत कथा। aja ekadashi vrat katha
अजा एकादशी व्रत कथा। aja ekadashi vrat katha.

अजा एकादशी व्रत कथा बहुत समय पहले एक दानी और सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र हुऐ। राजा हरिश्चंद्र इतने प्रसिद्ध सत्यवादी और धर्मात्मा थे कि उनकी कीर्ति से देवताओं के राजा इन्द्र को भी डाह होने लगी । इन्द्र ने महर्षि विश्वामित्र को हरिश्चन्द्र की परीक्षा लेने के लिये उकसाया । इन्द्र के कहने से महर्षि विश्वामित्र जी ने राजा हरिश्चन्द्र को योगबल से ऐसा स्वप्न दिखलाया कि राजा स्वप्न में ऋषि को सब राज्य दान कर रहे हैं ।

दूसरे दिन महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आये और अपना राज्य माँगने लगे । स्वप्न में किये दान को भी राजा ने स्वीकार कर लिया और विश्वामित्रजी को सारा राज्य दे दिया । महाराज हरिश्चन्द्र पृथ्वीभर के सम्राट् थे । अपना पूरा राज्य उन्होंने दान कर दिया था । अब दान की हुई भूमि में रहना उचित न समझकर स्त्री तथा पुत्र के साथ वे काशी आ गये ; क्योंकि पुराणों में यह वर्णन है कि काशी भगवान् शंकर के त्रिशूल पर बसी है । अत : वह पृथ्वी में होने पर भी पृथ्वी से अलग मानी जाती है ।

अयोध्या से जब राजा हरिश्चन्द्र जब चलने लगे तब विश्वामित्रजी ने कहा – ‘ जप , तप , दान आदि बिना दक्षिणा दिये सफल नहीं होते । तुमने इतना बड़ा राज्य दिया है तो उसकी दक्षिणा में एक हजार सोने की मोहरें और दो । राजा हरिश्चन्द्रके पास अब धन कहाँ था । राज्य – दान करने के साथ राज्य का सब धन तो अपने – आप दान हो चुका था । ऋषि से दक्षिणा देने के लिये एक महीने का समय लेकर वे काशी आये ।

काशी में उन्होंने अपनी पत्नी रानी शैव्या को एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया । राजकुमार रोहिताश्व छोटा बालक था । प्रार्थना करने पर ब्राह्मण ने उसे अपनी माता के साथ रहने की आज्ञा दे दी । स्वयं अपने को राजा हरिश्चन्द्र ने एक चाण्डालके हाथ बेच दिया और इस प्रकार ऋषि विश्वामित्र को एक हजार मोहरें दक्षिणा में दीं । महारानी शैव्या अब ब्राह्मण के घर में दासी का काम करने लगीं । चाण्डाल के सेवक होकर राजा हरिश्चन्द्र श्मशानघाट की चौकीदारी करने लगे ।

वहाँ जो मुर्दे जलाने के लिए लाये जाते , उनसे कर लेकर तब उन्हें जलाने देने का काम चाण्डाल ने उन्हें सौंपा था। एक दिन शमशान भूमि की तरफ गौतम ऋषि आ गए राजा ने ऋषि को प्रणाम किया गौतम ऋषि ने कहा कि किसी पूर्व जन्म के पाप के कारण आप की यह दशा हुई है यदि तुम भाद्रपद कृष्ण एकादशी का व्रत करो और अजा एकादशी व्रत कथा सुनो तो तुम्हारा इस हालत से उद्धार हो जाएगा।

राजा ने ऋषि की बात मानकर अजा एकादशी का व्रत करने लगे । एक दिन राजकुमार रोहिताश्व ब्राह्मण की पूजा के लिये फूल चुन रहा था कि उसे साँपने काट लिया । साँप का विष झटपट फैल गया और रोहिताश्व मरकर भूमि पर गिर पड़ा। उसकी माता महारानी शैव्याको न कोई धीरज बंधानेवाला था और न उनके पुत्र की देह श्मशान पहुँचाने वाला था । वह रोती – बिलखती पुत्र की देह को हाथों पर उठाये अकेली रात के समय में श्मशान पहुंचीं ।

वह पुत्र की देह को जलाने जा रही थी कि हरिश्चन्द्र वहाँ आ गये और मरघट का कर माँगने लगे । बेचारी रानी के पास तो पुत्रकी देह ढकने को कफन तक नहीं था । उन्होंने राजा को स्वर से पहचान लिया और गिड़गिड़ा कर कहने लगीं – ‘ महाराज ! यह तो आपका ही पुत्र है जो मरा पड़ा है । मेरे पास कर देने के लिए कुछ नहीं है । ‘ राजा हरिश्चन्द्र को बड़ा दुःख हुआ किंतु वे अपने धर्मपर स्थिर बने रहे ।

उन्होंने कहा – रानी मैं यहाँ चाण्डाल का सेवक हूँ । मेरे स्वामी ने मुझे कह रखा है कि बिना कर दिये कोई यहाँ मुर्दा न जला पावे । मैं अपने धर्म को नहीं छोड़ सकता। तुम मुझे कुछ देकर पुत्रकी देह जलाओ । रानी फूट – फूटकर रोने लगी और बोलीं – मेरे पास तो यही एक साड़ी है , जिसे मैं पहिने हूँ , आप इसी में से आधा ले लें । जैसे ही रानी अपनी साड़ी फाड़ने चलीं , वैसे ही वहाँ भगवान् नारायण , इन्द्र , धर्मराज आदि देवता और महर्षि विश्वामित्र प्रकट हो गये ।

महर्षि विश्वामित्रने बताया कि कुमार रोहित मरा नहीं है । यह सब तो ऋषि ने योग माया से दिखलाया था । राजा हरिश्चन्द्र को खरीदने वाले चाण्डाल के रूपमें साक्षात् धर्मराज थे । सत्य साक्षात् नारायणका स्वरूप है । अजा एकादशी व्रत के प्रभाव से तुम्हारे पाप नष्ट हो गए हैं सत्य के प्रभाव से राजा हरिश्चन्द्र महारानी शैव्या के साथ भगवान के धाम मे चले गये । महर्षि विश्वामित्र ने राजकुमार रोहिताश्व को अयोध्या का राजा बना दिया।

यह थी भाद्रपद कृष्णा अजा एकादशी व्रत कथा हम आशा करते हैं कि आप को अजा एकादशी व्रत कथा पसंद आई होगी धन्यवाद।

महत्व – अजा एकादशी के महत्व का वर्णन भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से भी किया था। युधिष्ठिर बोले – हे भगवन ! आप कृपा कर भाद्रपद एकादशी का वर्णन कीजिए । भगवान बोले – हे युधिष्ठिर ! इस एकादशी का व्रत करने और अजा एकादशी व्रत कथा सुनने से सब पाप छूटकर दूर होते हैं । और अन्त में सद्गति को प्राप्त होता है ।

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