महालक्ष्मी व्रत कथा।mahalaxmi vrat katha.

व्रत कथामहालक्ष्मी व्रत कथा।mahalaxmi vrat katha.

महालक्ष्मी जी का व्रत राधा अष्टमी से प्रारंभ होता है और अश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को समाप्त होता है। इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और महालक्ष्मी व्रत कथा सुनी जाती हैं।

इस दिन सर्वप्रथम लक्ष्मी जी की मूर्ति को स्नान कराएं और वस्त्र आभूषण आदि धारण कराकर भोग लगाएं आचमन करा कर पुष्प, धूप, दीप, चंदन आदि से आरती करें और आरती के पश्चात प्रसाद वितरित करें। रात्रि को चंद्रमा के निकलने पर उसे अर्घ्य दे और आरती करके स्वयं भोजन करें। इस व्रत के करने से धन-धान्य की वृद्धि होती है और सुख मिलता है।

इस दिन लोग हाथी पर बैठी मां लक्ष्मी की पूजा विधि विधान से करते हैं मान्यता है कि महालक्ष्मी व्रत को विधि विधान से कर महालक्ष्मी व्रत कथा सुनने से लक्ष्मी माता प्रसन्न होती हैं इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा को जरूर सुनना चाहिए। महालक्ष्मी व्रत कथा को सुने बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है इसलिए महालक्ष्मी की कथा (mahalaxmi ki katha) अवश्य सुने।

यहां व्रत के दिन सुनी जाने वाली महालक्ष्मी व्रत कथा दी गई है। तो आइए जानते हैं mahalaxmi vrat katha (mahalakshmi vrat katha).

महालक्ष्मी व्रत कथा। mahalaxmi vrat katha.

महालक्ष्मी व्रत कथा।mahalaxmi vrat katha.
महालक्ष्मी व्रत कथा।mahalaxmi(mahalakshmi) vrat katha.

महालक्ष्मी व्रत कथा – एक बार भगवान विष्णु भूलोक में गमन के लिए जाने लगे तब माता लक्ष्मी ने भी हठ किया कि वह भी उनके साथ भूलोक भ्रमण पर आना चाहती है। भगवान विष्णु के बहुत समझाने पर भी माता लक्ष्मी नहीं मानी और साथ जाने की जिद करने लगी तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं आपको एक शर्त पर साथ ले जा सकता हूं।

माता लक्ष्मी मन ही मन खुश हुई कि चलो सशर्थ ही सही भगवान के साथ जाने का अवसर तो मिला। माता लक्ष्मी ने कहा कि मुझे सारी शर्तें मंजूर है तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं जो कहूं, जैसा कहूं वैसा ही करना होगा। और फिर दोनों धरती पर आकर विचरण करने लगे। एक जगह आकर भगवान विष्णु ने कहा कि मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं आपको यहीं पर रुक कर मेरा इंतजार करना होगा।

ऐसा बोलकर भगवान विष्णु दक्षिण दिशा की ओर चले गए अब माता लक्ष्मी को जिज्ञासा हुई कि दक्षिण दिशा की ओर ऐसा क्या है जो भगवान मुझे अपने साथ लेकर नहीं गए। लक्ष्मी माता का स्वभाव वैसे भी चंचल है इसलिए वे वहां पर ज्यादा देर नहीं रुकी और दक्षिण दिशा में भगवान की तरफ जाने लगी। कुछ दूर जाने पर माता को सरसों का खेत दिखाई दिया।

सरसों का खेत फूलों से भरा हुआ था जिसने माता लक्ष्मी का मन मोह लिया वह वहीं पर रुक कर अपना श्रृंगार करने लगी। श्रंगार करने के बाद वे कुछ दूर गई कि उन्हें एक गन्ने का खेत दिखाई दिया माता को गन्ना खाने की इच्छा हुई और वह गन्ना तोड़कर खाने लगी। इतनी देर में भगवान विष्णु वहां पर आ गए।

जब भगवान ने माता लक्ष्मी को गन्ना खाते हुए देखा तो वह क्रोधित हो गए उन्होंने कहा कि आपने मेरी शर्त का उल्लंघन किया है। मैंने आपको वहां पर रुकने के लिए कहा था आप वहां पर नहीं रुकी और किसान के खेतों में से फूल और गन्ना तोड़कर अपराध किया है इसलिए आप को दंड अवश्य मिलेगा। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को 12 बरस तक किसान के यहां कार्य करने का शाप दे दिया।

अब विवश होकर माता लक्ष्मी को किसान के घर रहना पड़ा। एक दिन लक्ष्मी जी ने किसान की पत्नी को देवी लक्ष्मी की प्रतिमा की पूजा आराधना करने को कहा और बोला कि इससे तुम्हारी हर मनोकामना पूर्ण होगी व तुम जो भी मांगोगे वह तुम्हें मिलेगा। किसान की पत्नी ने वैसा ही किया वह हर रोज देवी लक्ष्मी जी की प्रतिमा की पूजा आराधना करने लगी।

कुछ दिनों में ही उनका घर धन्य-धान्य से पूर्ण हो गया और घर में सुख समृद्धि का वास हुआ। अब उनके दिन सुख पूर्वक बीतने लगे। धीरे-धीरे 12 बरस का समय व्यतीत हो गया जब भगवान विष्णु माता लक्ष्मी को लेने के लिए आए तो किसान की पत्नी लक्ष्मी जी के पैरों में गिर गई और उन्हें वापस ना जाने का आग्रह करने लगी।

इस पर लक्ष्मी जी ने कहा कि यदि वह कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की तेरस के दिन विधिपूर्वक मेरी पूजा करें तो वह उसके घर से कभी नहीं जाएगी। वह एक कलश या किसी पात्र की स्थापना करें और उसमें कुछ धन रखें। किसान ने माता लक्ष्मी के बताए अनुसार पूजा कर कलश की स्थापना की और किसान के घर सुख समृद्धि रहने लगी और घर धनधान्य से पूर्ण हो गया।

हे लक्ष्मी माता जैसे आपने किसान पर कृपा की वैसे सब पर करना महालक्ष्मी व्रत कथा सुनने वाले को, कहने वाले को,और हुंकारा भरने वाले पर करना।

यह थी महालक्ष्मी व्रत कथा हम आशा करते हैं कि आपको महालक्ष्मी व्रत कथा (mahalaxmi vrat katha) पसंद आई होगी धन्यवाद।

महालक्ष्मी जी की आरती

ओ३म् जय लक्ष्मी माता , मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसिदिन सेवत , हर विष्णु धाता ॥ ॐ …

उँमा , रमा , ब्रह्माणी , तुम ही जग – माता ।
सूर्य – चन्द्रमा ध्यावत , नारद ऋषि गाता ॥ ॐ …

दुर्गा रूप निरंजनि , सूख – सम्पत्ति दाता ।
जौकोई तुमको ध्यावत , ऋद्धि – सिद्धिधन पाता ॥ॐ …

तुम पाताल – निवासिनि , तुम ही शुभदाता ।
कर्म – प्रभाव – प्रकाशिनि , भवनिधि की त्राता ॥ ॐ …

जिस घर में तुम रहती , तह सब सद्गुण आता ।
सब सम्भव हो जाता , मन नहीं घबराता ॥ ॐ …

तुम बिन यज्ञ न होते , वस्त्र न हो पाता ।
खान – पान का वैभव , सब तुमसे आता ॥ ॐ …

शुभ – गुण मंदिर सुन्दर , क्षीरोदधि – जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन , कोई नहीं पाता ॥ ॐ …

महालक्ष्मीजी की आरती , जो कोई जन गाता ।
उर आनन्द अति उमंग , पाप उतर जाता ॥ ॐ …

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