Homeव्रत कथाविनायक जी की कहानी। vinayak ji ki kahani.

विनायक जी की कहानी। vinayak ji ki kahani.

सभी व्रत और त्योहारों में विनायक जी की कहानी सुनी जाती है। विघ्न विनायक श्री गणेश जी को देवताओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, गणेश जी को देवताओं में प्रथम पूज्य माना जाता है। इसलिए त्यौहार के दिन व्रत कथा सुनने के साथ विनायक जी की कहानी सुनी जाती है, इससे व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

विनायक जी की कहानी।vinayak ji ki kahani.


विनायक जी की कहानी। vinayak ji ki kahani.
विनायक जी की कहानी।

विनायक जी की कहानी – एक बार गणेश जी छोटे बालक के रूप में चिमटी में चावल और चमचें में दूध लेकर निकले। वो हर किसी से कह रहे थे कि कोई मेरी खीर बना दो, कोई मेरी खीर बना दो। वहाँ पर एक बुढ़िया माई बैठी थी, उसने कहा ला मैं बना देती हूं । वह छोटा सा बर्तन चढ़ाने लगी तो गणेश जी ने कहा कि दादी मां छोटी सी भगोनी मत चढ़ाओ तुम्हारे घर में जो सबसे बड़ा बर्तन हो वही चढ़ाओ। बुढ़िया माई ने गणेश जी का मन रखने के लिए बड़ा बर्तन चढ़ा दिया।

वह देखती रह गई कि वह जो थोड़े से चावल उस बड़े बर्तन में डाले थे वह तो पूरा भर गया है। गणेश जी ने कहा “दादी मां में नहा-धोकर आता हूं। जब खीर तैयार हो गई तो बुढिया माई के पोते-पोती खीर खाने के लिए रोने लगे। बुढ़िया ने कहा गणेश जी महाराज तेरे भोग लगना कहकर चूल्हे में थोड़ी सी खीर डाली और कटोरी भर भरकर बच्चों को दे दी। बुढ़िया की पड़ोसन ऊपर छतपर से देख रही थी तो बुढ़िया ने सोचा यह चुगली कर देगी, इसलिये एक कटोरा भर कर उसे भी पकड़ा दिया।

बेटे की बहू ने भी चुपके से एक कटोरी खीर ले जाकर खाई और कटोरा चक्की के नीचे छुपा दिया। अभी भी गणेश जी नहाकर नहीं आए थे और बुड़िया को भी भूख लग रही थी। तो वह भी एक कटोरी मे खीर डालकर के कीवाड़ के पीछे बैठकर एक बार फिर कहा कि गणेश जी महाराज आपके भोग लगे, यह कहकर खाना शुरु कर दिया तभी गणेश जी आ गए।

बुढिया माई ने कहा – आजा रे गणेश खीर खा ले में तो तेरा ही इंतजार कर रही थी। तब गणेश जी ने कहा- दादी मां मैंने तो खीर पहले ही खा ली। बुढ़िया ने कहा – कब खाई। गणेश जी ने कहा – जब तेरे पोते पोती ने खाई तब खाई थी, जब तेरी पड़ोसन ने खाई तब खाई थी ,और जब तेरी बहू ने खाई तब भी खाई थी और अब तूने खाई तो मेरा पेट पूरा ही भर गया।

बुढ़िया ने कहा – बेटा तेरी सारी बात सच है। लेकिन बहू बिचारी तो सुबह से काम में लग रही है तो फिर उसने खीर कब खाई।
गणेश जी महाराज ने कहा चक्की के नीचे देख झूठा कटोरा पड़ा है। तूने तो मेरे भोग तो लगाया वह तो बिना भोग के ही खा गई। बुढ़िया ने कहा बेटा घर की बात है घर में ही रहने दो। अब बताओ बची हुई खीर का क्या करूं गणेश जी ने कहा नगरी को जीमा दो। बुढ़िया माई ने पूरी नगरी जीमा दी फिर भी बर्तन खाली नही हुआ।

जब राजा को यह बात पता चली तो राजा ने बुड़िया को बुलाया और कहा क्यों री बुढ़िया ऐसा बर्तन तेरे घर पर कहां से आया ऐसा बर्तन तो राज महल में होना चाहिए। बुढ़िया ने कहा राजा जी इस बर्तन को आप ले लो। राजा जी ने खीर  का बर्तन महल में मंगा लिया लाते ही खीर में कीड़े, मकोड़े, बिच्छू, कंछले, हो गए और दुर्गंध आने लगी। यह देखकर राजा ने बुढ़िया से कहा, बुढ़िया बर्तन वापस ले जा,जा तुझे हमने दिया।

बुढ़िया ने कहा – राजा जी आप देते तो पहले ही कभी दे देते  यह बर्तन तो मुझे मेरे गणेश जी ने दिया है। बुढ़िया ने बर्तन वापस लिया लेते ही सुगंधित खीर हो गई। घर आकर बुढ़िया ने गणेश जी से कहा – बची हुई खीर का क्या करें। गणेश जी ने कहा बची हुई खीर को झोपड़ी के कोने में खड़ा खोदकर गाड़ दो। उसी जगह सुबह उठकर वापस खोदेगी तो धन के दो चरे मिलेंगे ऐसा कहकर गणेश जी अंतर्ध्यान हो गए जाते समय झोपड़ी के लात मारते हुए गये तो झोपड़ी की जगह पर महल हो गया।

सुबह बहू ने फावड़ा लेकर पूरे घर को खोद  दिया तो कुछ भी नहीं मिला बहू ने कहा – सासूजी थारो गणेश जी तो झूठों है।
सास ने कहा बहू मारो गणेश झूटों तो नहीं है। ला मैं देखूं । वह सुई लेकर खोजने लगी तो टन टन करते दो धन के चरे निकल आए। बहू ने कहा “सासू जी गणेश जी तो साचों ही हैं।  सास ने कहा “गणेश जी तो भावनाओं का भूखा है। 

हे गजानंद गणेश जी महाराज जैसा आपने बुढ़िया को दिया वैसा सबको देना, विनायक जी की कहानी कहने वाले, हुंकार भरने वाले और आसपास के सभी सुनने वाले सब को देना।

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