Sindhu Ghati sabhyata, जानिए सिंधु  सभ्यता के बारे में संपूर्ण जानकारी

सभ्यताSindhu Ghati sabhyata, जानिए सिंधु  सभ्यता के बारे में संपूर्ण जानकारी

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता एक ‘ काँस्य युगीन सभ्यता ‘ ( Bronze Age Civilization ) थी , जिसे सर्वप्रथम एक अंग्रेज़ चार्ल्स मेसन ने 1826 ई . में हड़प्पा नामक स्थान पर एक पुरास्थल के रूप में पहचाना , परन्तु वह इसकी प्राचीनता के बारे में कोई अनुमान नहीं लगा सका ।

harappa sabhyata ki khoj, हड़प्पा सभ्यता की खोज

इसे ‘ हड़प्पा सभ्यता ‘ भी कहा जाता है क्योंकि इसकी खोज ‘ सर्वप्रथम हड़प्पा स्थल ‘ पर ही हुई थी । इसे ‘ हड़प्पा सभ्यता ‘ नाम सर जॉन मार्शल ने दिया । यह सभ्यता सिन्धु नदी घाटी क्षेत्र में पनपी , अत : इसे सिंधु घाटी सभ्यता कहते हैं । सिंधु सभ्यता को आदा ऐतिहासिक युग ( Proto – historic Age ) की सभ्यता माना जाता है । -सिंधु घाटी सभ्यता की खोज का श्रेय रायबहादुर दयाराम साहनी को दिया जाता है , जिन्होंने पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक ‘ सर जॉन मार्शल ‘ के निर्देशन में सन् 1921 में सर्वप्रथम इस स्थल का पुनरान्वेषण कर 1922 से उत्खनन कार्य कराया । इस सभ्यता का विस्तार क्षेत्र त्रिभुजाकार था । अधिकांश विद्वानों के मतानुसार सिंधु सभ्यता के निर्माता द्रविड़ थे ।

सिंधु सभ्यता के प्रमुख नगर

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सिंधु सभ्यता के प्रमुख नगर

भारत में इसे प्रथम नगरीय क्रान्ति ( नगरीय सभ्यता ) भी कहा जाता है , क्योंकि हमें इस सभ्यता के लगभग आठ शहर मिले हैं
1. हड़प्पा , 2. मोहनजोदड़ी , 3. चन्हुदड़ो , 4. कालीबंगा , 5. बनवाली , 6.धौलावीरा , 7.सुरकोटड़ा , 8. लोथल

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Sindhu sabhyata ke bharat me sthal

सभ्यता के सर्वाधिक स्थल- गुजरात में ।

सभ्यता की नवीनतम खोज- ( शहर ) धौलावीरा ( गुजरात , 1991 )

सभ्यता का खोजा गया नवीनतम स्थल – बालाथल ( उदयपुर , पश्चिम में सुत्कागंडोर 1995 ) , कुनाल ( हरियाणा -1997 में )

सभ्यता का विस्तार क्षेत्र ( बलूचिस्तान – पाकिस्तान ) से , पूर्व में आलमगीरपुर ( उत्तर प्रदेश ) तक और उत्तर में मोडा / मांडा ( कश्मीर ) से दक्षिण में दायमाबाद ( महाराष्ट्र ) तक ।

सिंधु सभ्यता का विस्तार 1299600 वर्ग किमी . ( लगभग 13 लाख वर्ग किमी . ) क्षेत्र में था । पश्चिम से पूर्व तक इसकी लम्बाई लगभग 1600 किमी . तथा उत्तर से दक्षिण तक विस्तार लगभग 1400 किमी . क्षेत्र में था ।

सिंधु सभ्यता के अब तक लगभग 1000 स्थल खोजे जा चुके हैं ।

इस सभ्यता के स्थलों का फैलाव सिंधु नदी तंत्र , घग्घर – हाकडा नदी तंत्र तथा नर्मदा – ताप्ती नदी तंत्र तक विस्तृत था ।

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कार्बन डेटिंग ( C – 14 विधि ) के अनुसार इसका विकास काल 2350 ई . पूर्व से 1750 ई.पू. था ।

सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार भारत , पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान ( शोर्तुघई तथा मुंडीगाक ) में था ।

इस सभ्यता का प्रारंभिक काल संभवतः 3500 ई . पूर्व से 2600 ई . पूर्व तथा चरमोत्कर्ष काल 2500 ई . पूर्व से 1800 ई . पूर्व रहा होगा ।

भारतीय उपमहाद्वीप में ज्ञात प्राचीनतम कृषिपत बस्ती सभ्यता स्थल ) मेहरगढ़ ( वर्तमान पाकिस्तान में ) तथा भारत में सिंधु क्षेत्र के बाहर ज्ञात सर्वाधिक प्राचीन स्थल बालाथल ( उदयपुर ) है ।

सिंधु सभ्यता की विशेषताएं

सुनियोजित नगर नियोजन

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नगर व्यवस्था

यह एक नगराय या शहरी सभ्यता थी । समकालीन काँस्ययुगीन सभ्यताओं में सर्वश्रेष्ठ नगर नियोजन । हड़प्पा सभ्यता के सभी प्रमुख नगरों की बनावट लगभग एक समान थी । सम्पूर्ण नगर के दो भाग थे
पश्चिमी भाग ( पश्चिमी टीला ) , जो अपेक्षाकृत ऊँचा था तथा जो दीवारों ( चारदीवारी ) से सुरक्षित ( किलेबंद दुर्ग ) था । इसमें शासक व संभ्रात नागरिक रहते थे ।

पूर्वी भाग ( पूर्वी टीला ) , जो अपेक्षाकृत नीचा था तथा जहाँ रिहायशी बस्तियाँ थीं , जिनमें सामान्य नागरिक रहते थे । परन्तु ‘ लोथल ‘ ( गुजरात ) स्थल पर शहर के इस तरह से विभाजन के अवशेष नहीं मिले हैं ।

ग्रिड शैली में बसावट , जिसमें सड़कें सीधी थी एवं एक दूसरे को समकोण में काटती थीं ।
जल निकासी की विलक्षण भूमिगत व्यवस्था- गन्दे पानी के निकास हेतु भूमिगत छोटी , बड़ी तथा गहरी एवं ढंकी हुई नालियों की व्यवस्था थी ।
भवनों आदि के निर्माण में मानकीकृत -7.5 x15x30 सेमी या 10x20x40 सेमी आकार की पक्की ईंटों ( कालीबंगा व रंगपुर में कच्ची ईंटों का ) का प्रयोग होता था । पत्थर के भवनों का अभाव था । मकान सामान्यत : दो खण्डों में विभक्त होते थे ।
भवन के दरवाजे मुख्य सड़क पर न खुलकर गली में खुलते थे परन्तु लोथल इसका अपवाद है । वहाँ मकानों के दरवाजे मुख्य सड़क पर खुलने के अवशेष मिले हैं ।
भवनों की छतों के लिए लकड़ी का प्रयोग किया जाता था।

वृहद् अन्नागार – ये सिन्धु घाटी सभ्यता में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की उपस्थिति को दर्शाते हैं । मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से विशाल अन्नागारों के अवशेष प्राप्त हुए हैं । हड़प्पावासी अधिशेष अनाज को इन अन्नागारों में सुरक्षित रखते थे ।

हड़प्पा के उत्खनने में छ : -छ : अन्नागारी ( धान कोठार ) वाली ईंट के चबूतरे पर बनी दो श्रृंखलाएँ प्राप्त हुई हैं ।

मोहनजोदड़ो में प्राप्त विशाल अन्त्रागार का आकार 150×50 फीट है । इसकी उपस्थिति से वहाँ एक केन्द्रीय कर वसूलने वाली सत्ता की उपस्थिति का पता चलता है । ये अन्नागार दोनों ओर 6-6 की कतार में हैं ।

क्षेत्रफल की दृष्टि से मोहनजोदने सिंधु सभ्यता का सबसे बन स्थल था तथा भारत में सबसे बड़ा स्थल राखीगढ़ी है ।

सार्वजनिक स्नानागार : यह विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो ‘ में मिला है । यह 54 मीटर लम्बा एवं 33 मीटर चौड़ा था , जिसमें 11.89x7x2.43 मीटर ( 39x23x8 फीट ) का कुण्ड बना हुआ था । जलाशय के चारों ओर बरामदे व स्नान हेतु चबूतरे बने हुए थे । स्नानागार का फर्श पक्की ईंटों का बना हुआ था । जल कुण्ड के पेंदे को डामर द्वारा जलरोधी बनाया गया था । सर जॉन मार्शल ने इसे विश्व का एक अद्भुत निर्माण कहा है ।

मकान एक सीध में बने थे तथा उनकी खिड़कियाँ मुख्य सड़क पर न खुलकर बगल की गली में खुलती थी ।

शौचालयों के लिए सोख्ता गड्डों का इस्तेमाल होता था । प्रारंभिक हड़प्पावासी मिट्टी के बर्तनों के निर्माण हेतु पैर से चलाये जाने वाले चाक प्रयोग में लेते थे ।
परिपक्व हड़प्पा सभ्यता के काल में हाथ से चलाये जाने चाक ( कुम्हार का चाक ) का प्रयोग किया जाने लगा था ।

मोहनजोदडो में एक बहुस्तंभीय सभागार तथा एक आयताकार भवन के अवशेष मिले हैं । ये संभवत : प्रशासकीय कार्यों हेतु प्रयुक्त होते थे ।

मोहनजोदड़ो में बुने हुए कपड़े का एक टुकड़ा भी मिला है । मोहनजोदडो के निचले शहर में एक मंदिरनुमा इमारत मिली है , जिसमें ऊँचे चबूतरे पर बैठने की मुद्रा में पत्थर की मूर्ति मिली है ।

हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की निचली बस्ती में एक कक्षीय बैरकनुमा आवास भी मिले हैं । इनमें संभवत मजदूर वर्ग रहता था ।
‘ चहून्दड़ो ‘ ( पाकिस्तान ) एक मात्र सिंधु शहर है , जहाँ दुर्ग के अवशेष नहीं मिले हैं ।

कालीबंगा ( हनुमानगढ़ , राजस्थान ) से आद्य हड़प्या काल ( प्राक् या पूर्व हड़प्पा ) एवं परिपक्व हड़प्पाकालीन संस्कृति हैं।
दोनों सभ्यताओं के अवशेष अलग – अलग स्तरों में प्राप्त हुए हैं ।
आद्य हड़प्पाकाल में खेतों को जोता जाता था । परंतु हड़प्पा काल शायद उन्हें खोदा जाता था ।
कालीबंगा में प्राप्त नगर के दोनों ही भाग सुरक्षा दीवार ( परकोटे ) से घिरे हुए हैं । अन्य स्थानों पर केवल उच्च भाग ( दुर्ग ) ही परकोटे से बंद था ।
प्रसिद्ध सिंधु स्थल ‘ लोथल ‘ ( गुजरात ) में ईंट से निमित्त ‘ गोदीबाडा ‘ ( Dockyard ) के अवशेष प्राप्त हुए हैं । यह सिंधु वासियों का प्रमुख बंदरगाह रहा होगा । अभी तक अन्य किसी सिंधु स्थल में गोदीबाड़े के अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं । यह गोदीबाड़ा लगभग चतुर्भुजाकार था । इसके चारों ओर ईंटों की दीवार थी । ‘ चावल की खेती के प्राचीनतम प्रमाण लोथल से प्राप्त हुए हैं ।
इसके अलावा रंगपुर ( गुजरात ) में भी चावल का भूसा प्राप्त हुआ है ।
सुरकोटड़ा ‘ ( कच्छ , गुजरात ) एकमात्र सिंधु स्थल है , जहाँ से वास्तव में घोडे के अवशेष प्राप्त हुए हैं । यह नगर पत्थर के टुकड़ों की दीवार से घिरा हुआ था । सुरकोटड़ा संभवत : सिंधुवासियों का अन्य बंदरगाह नगर था , परंतु यहाँ लोथल की तरह गोदीबाड़े के अवशेष नहीं मिले हैं । ‘ धोलावीरा ‘ ( गुजरात ) में आर.एस. विष्ट के निर्देशन में उत्खनन हुआ है । इस सिंधु सभ्यता स्थल में नगर के तीन भाग ( जबकि अन्य सभी नगरों में दो भाग ) मिले हैं । इसके दो हिस्सों की दीवार से मजबूत घेराबंदी की गई थी । धौलावीरा में दो आंतरिक अहाते मिले हैं • नगर दुर्ग , जहाँ संभवत : शासक वर्ग ( उच्चतम सत्ता ) का निवास था ।

मध्य नगर , जहाँ संभवतः शासक वर्ग के निकटतम संबंधी अन्य अधिकारी रहते होंगे । यह धौलावीरा की खास विशेषता है । निचला शहर से अलग ‘ मध्य शहर ‘ का अस्तित्व केवल धौलावीरा में ही मिला है । इसके अलावा यहाँ अन्य सिन्धु स्थलों की भाँति निचला शहर , जहाँ सामान्य नागरिक रहते थे , भी मिला है । धौलावीरा में सिंधु सभ्यता के तीनों चरणों के अवशेष मिले हैं । इसे सात सांस्कृतिक चरणों में बाँटा गया है । यहाँ विशाल जलाशय के अवशेष मिले हैं , जो आश्चर्यजनक है । इसकी जल प्रबन्धन व्यवस्था अति उत्तम थी ।
कालीबंगा में एक चबूतरे पर एक पंक्ति में ‘ सात अग्निकुण्ड ‘ तथा एक गड्डे में पशुओं की हड्डियाँ व मृग भृंग पाये जाते हैं ।

अल्लाहदीनो ( पाकिस्तान ) सिंधु स्थल का आकार मात्र 2 एकड़ के लगभग है । यह सबसे छोटा सिंधु स्थल था ।
सिंधु सभ्यता की अधिकांश मुहरों पर बिना कूबड़ के एक बाले बैल का अंकन भी मिला है । सींग वाले सांड की आकृति है । कुछ हड़प्पा मुहरों पर कूबड़ सूअर व भैंस की हड्डियाँ सभी स्थानों से मिली हैं ।
ऊंट की अस्थियाँ केवल कालीबंगा में प्राप्त हुई हैं । बैलगाड़ी की आकृति हड़प्पा एवं चहून्दड़ो से मिली है ।
भारत में चाँदी सर्वप्रथम सिंधु सभ्यता में पाई गई है । चाँदी भारत के बड़े बर्तन भी मिले हैं ।
रेहड़ी एवं सुकुर स्थलों पर पत्थर से चर्ट फलकों व फ्लिट फलकों का निर्माण कर अन्य स्थलों को निर्यात किया जाता था ।
सिंधु संस्कृति में ‘ सीपी निर्माण ‘ कार्य एक विकसित शिल्प था । बालाकोट ( बलूचिस्तान ) , लोथल एवं चहून्दड़ो सीप एवं चूड़ी निर्माण के प्रमुख केन्द्र थे । लोथल एवं चहून्दड़ो में कार्नेलियन के सुराखदार मनकों का निर्माण होता था । मनकों का निर्यात ‘ मेसोपोटामिया ‘ तक होता था । चहूदड़ो में सर्वाधिक मात्रा में मनके मिले हैं ।

बर्तनों पर चिड़िया , मछली , पशु , पेड़ तथा पीपल की आकृतियों का अंकन मिलता है ।

सिंधुवासी चाँदी , स्वर्ण , शीसा , ताँबा , काँसा आदि प्रमुख धातुओं का प्रयोग करते थे । सोने से मनकों , झुमकों , ताबीजों , कलंगी एवं सूई आदि निजी आभूषणों का निर्माण होता था । सिंधुवासियों का अन्तर्खेत्रीय व्यापार राजस्थान , सौराष्ट्र , महाराष्ट्र , दक्षिण भारत , पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा बिहार के क्षेत्र के लोगों के साथ होता था ।

सिंधुवासियों के आयात की मुख्य चीजें थीं- बहुमूल्य धातु से सोना ( अफगानिस्तान , फारस तथा दक्षिण भारत से ) , ताँबा ( राजस्थान , बलूचिस्तान तथा अरब से ) तथा टीन d ( अफगानिस्तान एवं बिहार से ) । इसके अलावा अर्द्ध – कीमती पत्थर जैसे- लाजवर्द ( अफगानिस्तान ) , फिरोजा ( फारस ) , जामनी ( महाराष्ट्र ) , गोमेद ( सौराष्ट्र ) , संगशयब ( मध्य एशिया ) तथा शंख ( सौराष्ट्र एवं दक्कन से ) मँगाए जाते थे ।
निर्यात की चीजें- गेहूँ , जौ , मटर , तिलहन जैसे कृषि उत्पाद तथा कपास की वस्तुएँ , मिट्टी के बर्तन , कार्नेलियन के मनके , सीपी की वस्तुएँ , टेराकोट मूर्तियाँ , हाथी दाँत की चीजें तथा अन्य सामान ।
सुमेरिया ‘ ( मेसोपोटामिया ) तथा सिंधु सभ्यता के बीच व्यापारिक संपर्क के कई साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध हैं । सुमेर के ग्रंथों में ‘ मेलुहा ‘ से व्यापारिक संबंधों की चर्चा है , जो कि संभवतः सिंधु क्षेत्र का प्राचीन नाम है । इनमें दो मध्यवर्ती व्यापारिक स्थानों – दिलमन ( बहरीन ) तथा मकन ( मकरान तट ) – की चर्चा भी है ।

हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो से प्राप्त कई मुहरों पर जहाजों की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं । टेराकोटा के एक जहाज का आकार लोथल से प्राप्त हुआ है , जिसमें मस्तूल लगाने के लिए सुराख बना है ।

हड़प्पा तथा चहूँदड़ो से ताँबे अथवा काँसे की बैलगाड़ी की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं , जिन पर उनका चालक भी बैठा हुआ है । इसके साथ ही वहाँ से इक्कों की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं जो पंजाब में अब भी प्रचलित हैं ।

सिंधुवासियों को लोहे की जानकारी होने के प्रमाण नहीं मिले हैं ।

सिंधु समाज मातृ सत्तात्मक था


शिकार करना सिंधुवासियों के मनोरंजन का प्रमुख साधन था ।
आवागमन के लिए बैलगाड़ियों का प्रयोग किया जाता था ।

लिपि का ज्ञान

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सिंधुवासियों को लिपि का ज्ञान था । इस लिपि को ‘ भाव चित्रात्मक लिपि ‘ ( Pictographic ) व गोमूत्राक्षर लिपि भी कहा गया है । इस लिपि की लिखावट अधिकांश बायीं से दायीं ओर है तथा कुछ लेखन दायीं से बायीं ओर भी हुआ है । कुछ मुहरों में क्रमशः दाई ओर से बाई ओर तथा फिर बाई ओर से दाई ओर लिखा गया है । बी.बी. लाल ने इसे ‘ बुस्ट्रोफेदम’ नाम दिया है । यह लिपि अभी तक पढ़ी नहीं गई है । इस लिपि के लगभग 400 चिह्नों की पहचान की जा चुकी है । इसमें चिड़िया , मछली तथा विभिन्न प्रकार की मानवाकृतियाँ बनी हुई हैं । हड़प्पा की लिपि में संकेतों की संख्या 400 से 600 के बीच मानी गई है , जिसमें 40 से 60 मूल हैं तथा अन्य उनके विभिन्न अभिरूप हैं । मूल संकेतों में कई चिह्न लगाकर अभिरूप बनाए गए हैं ।

हड़प्पा सभ्यता की भाषा

हड़प्पा वासियों की भाषा अभी अज्ञात है। अब तक भाषा की प्रकृति के संदर्भ में दो प्रकार के तर्क दिए गए हैं _यह या तो indo-european या इंडो_आर्य समूह की भाषा है। या द्रविड़ परिवार की है

द्रविड़ परिकल्पना को स्वीकार करने में लगभग सहमति से बन गई हैं।

हड़प्पा सभ्यता के कब्रिस्तान

सिंधुवासी मृतक के पैर दक्षिण दिशा में एवं सिर उत्तर में रखकर गाढ़ते थे । पुरातत्वेत्ताओं ने मोहनजोदड़ो , हड़प्पा , कालीबंगा , लोथल तथा रोपड़ जैसे कई स्थानों पर कब्रिस्तानों का उत्खनन किया है । ये कब्रिस्तान साधारणतः बस्तियों की परिधि में हैं । मोहनजोदड़ो में अंतिम संस्कार की तीन विधियाँ थीं- पूर्ण दफन , आंशिक दफन ( शव को जंगली जानवरों तथा चिड़ियों के समक्ष कुछ दिन छोड़कर कुछ अस्थियों का दफन ) तथा दाह संस्कार के बाद दफन । लेकिन साधारणतः पूर्ण दफन का प्रयोग होता था जिसमें मृतक शरीर को पीठ के बल , सिर को साधारणतः उत्तर दिशा में व पैर दक्षिण दिशा में रखकर दफनाया जाता था।

राजनैतिक स्थिति

राजनीतिक व्यवस्था के बारे में कोई भी स्पष्ट प्रमाण नहीं है। इतना स्पष्ट है कि हड़प्पा के शासन की व्यवस्था कुशल और संगठित थी।

सिंधु सभ्यता में कृषि

  • गेहूँ व जौ मुख्य खाद्यान्न
  • लोथल से धान ( चावल ) और बाजरे की खेती के साक्ष्य ।    कपास की खेती के आरम्भिक साक्ष्य ।
  •    सिंधुवासियों को विश्व में सर्वप्रथम कपास की खेती करने का श्रेय दिया जाता है ।
  •     चावल की खेती के साक्ष्य केवल लोथल व रंगपुर ( दोनों गुजरात ) में मिले हैं ।
  • कालीबंगा से जुते हुए खेत के प्रारम्भिक ( प्राचीनतम ) प्रमाण प्राप्त ।     यहाँ दो दिशाओं में एक – दूसरे से समकोण बनाते हुए हल जोतने के चिह्न अभी भी सुरक्षित हैं ।
  • हल ‘ से अनभिज्ञ लेकिन मुख्यत : कुदाल ‘ का प्रयोग ।

पशुपालन

  • एक सींग का बिना कूबड़ वाला तथा कूबड़ वाला बैल पूज्य ।        बैल , भेड़ , बकरी , कुत्ता , बिल्ली मुख्य पशु ।
  •        भैंस , हाथी , गधे , सूअर , गाय , गैंडे से परिचित । सिन्धु स्थलों से घोड़े के प्रामाणिक साक्ष्य नहीं मिले हैं ।
  •         लोथल से घोड़े की मृण्मूर्ति एवं सूरकोटड़ा से घोड़े की हड्डियों के अवशेष मिले हैं ।

कला

  • मृद पाण्ड-         सिंधु सभ्यता के स्थलों से दो प्रकार के मृद भाण्ड- एक बिना डिजायन वाले तथा दूसरे चित्रित मृदभाण्ड पर्याप्त मात्रा में फैले हैं ।           यहाँ बहुसंख्यक गुलाबी रंग के चमकीले मृद भाण्ड प्राप्त हुए हैं , जिन पर गहरे लाल व काले रंग से चित्र बने हुए हैं ।
  • विभिन्न पशु आकृतियों के मिट्टी के खिलौने प्राप्त ।
  • मातृ देवी की अनेक मृणमूर्तियाँ मिली हैं ।
  •      सील- मुहरें ( सीलें ) अधिकांशतः सेलखड़ी ( स्टेटाइट मुलायम पत्थर ) की बनी हुई हैं । ये सिंधुवासियों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कलात्मक रचनाएँ हैं ।
  • अधिकांशतः वर्गाकार व कुछ आयताकार सीलें या मोहरें प्राप्त हुई हैं ।
  • कुछ सीलें हाथीदाँत की भी हैं । सबसे प्रसिद्ध सील पशुपति ( योगी ) की सील है , जिसके सिर पर सींग अथवा सींगयुक्त मुकुट है तथा वह पद्मासन लगाए चौकी पर विराजमान है ।
  • इसके दाहिनी ओर एक हाथी और एक बाघ तथा बाईं ओर एक गैंडा व एक भैंसा दर्शाया गया है । मुख्यतः एक सींग वाले बिना कूबड़ वाले सांड की मुहरें मिली है।
  • साथ ही कुछ कुबड़ वाले बैल  की सीले भी प्राप्त हुई है।
  • सीलों का आकार आधा इंच से ढाई इंच तक है । वर्गाकार मुहरों पर जानवरों की आकृति एवं अभिलेख खुदे हुए हैं तथा आयताकार मुहरों पर केवल संक्षिप्त अभिलेख हैं ।
  • काँस्य मूर्ति प्राप्त हुई है , जिसमें जडा बाँधे एक युवती नृत्य नर्तकी की मोहनजोदड़ो से 12 सेन्टीमीटर लम्बी एक मुद्रा में दिखाई गई है ।
  • हड़प्पा से लाल पत्थर की बनी खड़े नग्न पुरुष की मूर्ति प्राप्त हुई है ।
  • पत्थर की मूर्तियों में सर्वोत्तम उदाहरण मोहनजोदड़ो से प्राप्त सेलखड़ी निर्मित दाढ़ी वाले व्यक्ति का है , जिसके वस्त्र – आभूषण सज्जित हैं ।
  • इसके अतिरिक्त कपड़े बुनने के तथा सोना चाँदी के आभूषणों की प्राप्ति से सिन्धु सभ्यता में धातु कला के प्रमाण भी मिले हैं । लोथल व देसलपुर से ताँबे की मुहरें भी मिली हैं ।
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हड़प्पा से प्राप्त नृतकी की मूर्ति

व्यापार

  • चूँकि यह एक नगरीय सभ्यता थी अतएव व्यापार का अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान था ।
  • यहाँ से कपास , गेहूँ , गन्ना , हाथी दाँत आदि का निर्यात होता था । इसके प्रमाण मेसोपोटामिया ( सुमेरिया ) क्षेत्र से प्राप्त हड़प्पन सीलें ) अभिलेख हैं ।
  • सिन्धुवासी सम्भवतः ताँबा गणेश्वर ( राजस्थान ) , थे । विभिन्न प्रकार की धातुओं का आयात दक्षिण और पूर्वी सीलें व भारत , कश्मीर , कर्नाटक और नीलगिरी से होता था ।
  • उद्योग , व्यापार व वाणिज्य आधारित अर्थव्यवस्था मोहनजोदड़ो से प्राप्त मिट्टी की बैलगाड़ियों के नमूने , हडप्पा से प्राप्त ताँबे का एक छोटा – सा रथ , सिन्धु घाटी में बिछा हुआ सड़कों का जाल तथा लोथल बंदरगाह के साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि व्यापार जल और थल दोनों ही मार्गों से होता था ।
  • सिंधुवासियों के मेसोपोटामिया ( या सुमेरिया आधुनिक ईराक ) , अफगानिस्तान , बहरीन व मध्य एशिया क्षेत्र के साथ व्यापारिक संबंध थे ।
  • सिक्कों का प्रचलन न होने के कारण क्रय – विक्रय संभवत वस्तु विनिमय के माध्यम से किया जाता होगा।

माप तौल प्रणाली

  • हड़प्पावासी व्यावसायिक तथा निर्माण कार्यों में माप तौल का प्रयोग करते थे ।
  • तौल के रूप में प्रयुक्त कई चीजे प्राप्त हुई हैं ।
  • तौल पद्धति की एक श्रृंखला 1 , 2,4,8 से 64 इत्यादि । की तथा 16 के दशमलव गुणाजों की थी ।
  • सिंधु सभ्यता के नगरों में माप – तौल की इकाईयों में एकरूपता मिलती है ।
  • माप चिह्नों से युक्त कई छड़ें प्राप्त की गई हैं ।
  • हड़प्पावासी माप की रैखिक प्रणाली के जनक थे , जो कि ‘ अर्थशास्त्र के अंगुल के बराबर था , जिसका प्रचलन अभी तक भारत में हो रहा है ।
  • हड़प्पा में निचली बस्ती में 16 भट्टियाँ मिली हैं तथा एक मिट्टी का मूषा मिला है । संभवतः यहाँ ताँबा गलाने का काम होता था ।
  • सिंधु सभ्यता स्थलों पर प्रयुक्त ईटों का आकार 4:2: 1 के अनुपात में था।

सिंधु वासियों के लिए कच्चे माल के स्रोत

  • चाँदी -अफगानिस्तान व ईरान से ।
  • सोना – कोलार ( कर्नाटक ) की खानों से ।
  • तांबा  मुख्यतः गणेश्वर व जोधपुरा ( राजस्थान ) से ।  
  • टिन –  अफगानिस्तान व ईरान से ।    
  • लाजवर्द –  गुजरात , अफगानिस्तान से ।
  • फिरोजा व जेड –  मध्य एशिया से ।     
  • फ्लिंट व चर्ट प्रस्तर खण्ड-  सिंध ( पाकिस्तान ) की रोड़ी व सख्खूर खदानों से । 
  • अलाबस्तर – संभवतः अफगानिस्तान से

सिंधिवासियों का धर्म

  • मुहरों , मुहरों के छापों , ताबीजों तथा ताम्र – गोलियों से हम हड़प्पावासियों की धार्मिक प्रवृत्ति की जानकारी प्राप्त करते हैं ।
  • मुख्य पुरुषदेवता ‘ पशुपति महादेव ( आद्य शिव ) ‘ हुआ करता था , जिसे मुहरों में योगी की मुद्रा में बैठा हुआ , तीन मुखों एवं दो सींगों से युक्त दिखाया गया है ।
  • वह चार पशुओं ( हाथी , बाघ , बारहसिंगा एवं भैंस , प्रत्येक का मुख अलग अलग चार दिशाओं में ) से घिरा हुआ है तथा दो हिरण उसके पैर के बैठे मुख्य देवी मातृ देवी ( पृथ्वी देवी ) थी , जिसे टराकोटा मूर्तियों में प्रदर्शित किया गया है । लिंग पूजा के पर्याप्त प्रमाण हैं , जिन्हें बाद में शिव के साथ जोड़ा गया है । लिंग के अतिरिक्त पत्थर की कई योनि आकृतियाँ भी प्राप्त हुई हैं । सिंधुवासी देवताओं की पूजा वृक्षों ( पीपल आदि ) तथा पशुओं ( एक सींग वाला तथा बिना कूबड़ का सांड आदि ) के रूप में भी करते थे । वे भूत – प्रेतों में विश्वास करते थे तथा उनसे रक्षा के लिए ताबीजों का प्रयोग करते थे । मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं । इस काल में बैल ( सांड ) को शक्ति के रूप में पूजा जाता था।

सिंधु वासियों में पूजा प्रथा

  • मातृ देवी की पूजा
  • लिंग पूजा
  • पशुपति ( शिव ) की पूजा
  • पशु पूजा- कूबड़ युक्त बैल एवं एक सींग वाला बैल ।
  • वृक्ष पूजा – पीपल का वृक्ष
  • अग्नि पूजा के परोक्ष प्रमाण ( कालीबंगा व लोथल से अग्निकुण्ड की प्राप्ति )

अवसान– सिन्धु घाटी सभ्यता के अवसान की दो धारणाएँ हैं ।


यकायक – बड़ी दुर्घटना जैसे भूकम्प आदि या आक्रमण द्वारा । मार्टिमर व्हीलर का मत है कि आर्यों के आक्रमण ने इस सभ्यता को नष्ट किया ।


क्रमिक अवसान – जलवायु परिवर्तन के कारण जैसे- बाढ़ ( मोहनजोदड़ो एवं चहून्दड़ो ) , नदियों का सूखना ( कालीबंगा व बनवाली ) , भूमि की उर्वरता में कमी , जंगलों का विनाश , भूकम्प आदि। ओरेल स्टीन इस मत के समर्थक हैं ।


भयंकर बाढ़ या अत्तिवृष्टि से यह सभ्यता नष्ट हुई । इसके प्रमाण जॉन मार्शल , मैके , एस . आर राव , राइक्स आदि ने दिये हैं ।


अनावृष्टि ( सूखा ) , जलवायु परिवर्तन व नदियों का मार्ग परिवर्तन – इस मत के पक्षधर लेमब्रिक , डेल्स आदि हैं

सिंधु घाटी सभ्यता की भारत को देन

हल्का प्रयोग व जुताई_

आज भी पश्चिमोत्तर भारत में उसी पद्धति (कालीबंगा किस शैली) से जुताई होती है।

16 के गुणज में व्यवह्रत माप तोल का पैमाना

केश विन्यास

मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की मूर्ति की तरह केश का विन्यास आज भी प्रचलित है।

धार्मिक प्रभाव

  • मातृ देवी की पूजा इसका रूपांतरण सनातन धर्म की विभिन्न देवियों के रूप में हुआ
  • पशुपति शिव की पूजा
  • पीपल वृक्ष की पूजा
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