Homeहिन्दू धर्महिन्दू धर्म में विवाह के प्रकार व रीति रिवाज

हिन्दू धर्म में विवाह के प्रकार व रीति रिवाज

ऋग्वैदिक काल में विवाह एक पवित्र एवं सामाजिक संस्था का रूप ले चुका था । विवाह का प्रयोजन धर्म का पालन करना एवं वंशवृद्धि करना था । विवाह सामान्यतः वयस्कावस्था में ही होता था । • विवाह संस्कार का पूर्ण विवरण हमें गृहसूत्रों से प्राप्त होता है

ऋग्वेद के दसवें मण्डल में ‘ विवाह – सूक्त ‘ है , जिससे वैदिक वैवाहिक रीति – रिवाजों का ज्ञान होता है । विवाह प्रथा ‘ दीर्घतमा ऋषि ‘ ने कायम की थी , जिसमें बाद में श्वेतकेतु औदालिक ने सुधार किया था ।
वैदिक काल में बाल विवाह का प्रचलन नहीं था । विवाह की उम्र सामान्यतः 16-17 वर्ष थी
स्वैच्छिक वर – वधु चुनने का अधिकार था । अथर्ववेद में ‘ स्वयंवर – प्रथा ‘ का उल्लेख है ।
विवाह में माता – पिता की अनुमति आवश्यक होती थी । एक पत्नी प्रथा आम रूप से प्रचलित थी । कहीं – कहीं न राजाओं एवं धनिकों में बहु – विवाह ( बहुपत्नी प्रथा ) भी होते थे । ‘ नियोग प्रथा ‘ विद्यमान थी ।
इसके अन्तर्गत पति की मृत्यु हो जाने पर पत्नी अपने देवर या निकट संबंधी से सहवास द्वारा पुत्र प्राप्त कर सकती थी । विधवा विवाह का उल्लेख अथर्ववेद में है । सती – प्रथा विद्यमान नहीं थी ।
विदुषी महिलाओं को ‘ ब्रह्मवादिनी ‘ कहा जाता था । • जो कन्या आजीवन विवाह नहीं करती थी , उसे अमाजू कहते थे ।
विधवा का पुनर्विवाह हो जाने पर उसे पुनर्भू कहते थे ।

विवाह के प्रकार

ब्रह्म विवाह –

यह सर्वोत्तम प्रकार का विवाह है । इसमें पिता अथवा अभिभावक उत्तम सजातीय योग्य वर को आमंत्रित कर , वस्त्र और आभूषणों से अलंकृत कर अपनी कन्या को धार्मिक विधि से अनुष्ठान के साथ ‘ वर ‘ को देता था ।

दैव विवाह

इस प्रकार के विवाह में कन्या पक्ष द्वारा कन्या को वस्त्राभूषण से अलंकृत कर यज्ञ करने . वाले पुरोहित को दान में दे दिया जाता था ।

आर्ष विवाह

इसमें कन्या का पिता वर से एक अथवा दो गाय धार्मिक कृत्यों हेतु लेकर अपनी कन्या दान कर देता था ।

प्रजापत्य विवाह –

इस प्रकार के विवाह में वर पक्ष कन्या के पिता से कन्या को माँगता था ।

आसुरी विवाह –

इस विवाह में पुरुष कन्या के माता पिता को यथाशक्ति धन देकर कन्या को प्राप्त करता था

गंधर्व विवाह –

जिसमें स्त्री व पुरूष परस्पर निश्चय कर एक – दूसरे के साथ गमन करते हैं , वह गंधर्व विवाह कहलाता है ।

पैशाच विवाह –

सोई हुई अथवा पागल कन्या के साथ मैथुन करना पैशाच विवाह कहलाता है ।

राक्षस विवाह –

रोती – बिलखती कन्या का बलपूर्वक अपहरण कर उससे किया गया विवाह राक्षस विवाह कहलाता है ।

  • प्रशंसनीय विवाह के अंतर्गत ब्रह्म , दैव , आर्ष तथा प्रजापत्य विवाह आते हैं ।
  • निंदनीय विवाह के अंतर्गत आसुर , गंधर्व , पैशाच तथा राक्षस विवाह आते हैं ।
  • विवाह के समय वर – वधु द्वारा पहने जाने वाले वस्त्र को ‘ वाधूय ‘ कहा जाता था । अन्तर्वर्ण विवाहों के उल्लेख भी
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