एड्स (AIDS)। एड्स रोग के फैलने के कारण,लक्षण,निदान,नियंत्रण और उपचार।

diseaseएड्स (AIDS)। एड्स रोग के फैलने के कारण,लक्षण,निदान,नियंत्रण और उपचार।

एड्स (AIDS)- एड्स का पूरा नाम एक्वायार्ड इम्यूनो डेफिशियंसी सिंड्रोम है । यह एक वाइरसजनित रोग है । इस रोग में वाइरस का नाम ह्यूमन इम्यूनो वाइरस ( HIV ) है । इस रोग में फैलने के मुख्य कारण रुधिर स्थानान्तरण , यौन सम्बन्ध , इन्जेक्शन की सुई का परस्पर उपयोग , नशीली दवाईयों का सेवन आदि है । एक दूसरे से रेजर , ब्रुश आदि के उपयोग से भी यह रोग फैलता है । इस रोग के वाइरस शरीर में प्रवेश कर रोगी की प्रतिरोधी क्षमता को नष्ट कर देते हैं , जिससे वह अन्य बीमारियों से रोगग्रस्त हो जाता है और अन्त में इस रोगी की मृत्यु हो जाती है । इस रोग में लम्बे समय तक ज्वर बना रहता है और धीरे – धीरे प्रतिरोधी क्षमता नष्ट हो जाती है । एड्स ( AIDS ) का सर्वप्रथम जून , 1981 में लोस एन्जैलेस के समलिंगी homosexual ) पुरुषों में पहचाना गया था जो एक दुर्लभ प्रकार के निमोनिया से पीड़ित थे । पाश्चर इंस्टिट्यूट पेरिस के फ्रेकॉइज के बारे – सिनूसी ( fracoise Barre – Sinoussi ) , जीन – क्लाउड शर्मेन ( Jean – Claude Chermann ) व लुक मोटोग्नियर ने 1983 में तथा नेशनल कैंसर इन्स्टिट्यूट अमेरिका के रॉबर्ट सी . गैलो ( Robert C.Gallo ) के नेतृत्व वाली टोली ने 1984 में इस रोग के कारक की खोज की , जिसके फलस्वरूप उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । फ्रान्स के समूह ने इस कारक का नाम LAV अर्थात् लिम्फएडिनोपेथी का सहचर वाइरस ( Lymphadenopaty – Associated Virus ) तथा अमेरिका के समूह ने HTLV – III अर्थात् ह्यूमेन टी – लिम्फोट्रोपिक वाइरस का 111 प्रकार ( Human T – Lymphotropic Virus type – III ) रखा ।

एड्स रोग का प्रसार व विस्तार । एड्स रोग के फैलने के कारण

एड्स के प्रसार – विस्तार के कारण को मूलतः दो भागों में बाँटा जाता ( 1 ) प्रत्यक्ष ( Direct ) ( 2 ) अप्रत्यक्ष ( Indirect )

( 1 ) प्रत्यक्ष ( Direct ) – प्रत्यक्ष रूप से एड्स अधिकाधिक यौन सम्बन्धों के कारण होता है । अमरीका में एड्स के रोगियों में 75 % यौन सम्बन्धों के कारण ही प्रभावित हुए । नशीली दवाओं का सेवन करने वाले लोगों के शरीर में एड्स का वाइरस प्रवेश करने के ज्यादा अवसर होते हैं , क्योंकि वे नशे की व्याकुलता के कारण सुई को साफ नहीं करते हैं और एड्स का वाइरस सुई के माध्यम से एक शरीर से दूसरे शरीर में आसानी से पहुँच जाता है ।

( 2 ) अप्रत्यक्ष ( Indirect ) – रक्तदान यानी खून चढ़ाना या बदलना भी एड्स के फैलने का एक महत्त्वपूर्ण कारण है । हीमोफीलिया के मरीज के खून में फैक्टर- VII और फैक्टर- VIII नहीं होता है । ऐसे में सैकड़ों मनुष्य के एकत्रित खून से फैक्टर- VII व फैक्टर VIII निकालकर हीमोफीलिया के मरीज को दिया जाता है । उन सैकड़ों मनुष्यों में से यदि एक में भी एड्स का वाइरस हो तो हीमोफीलिया के इस रोगी का एड्स से प्रभावित होना निश्चित है ।

एड्स रोग के लक्षण ( Symptoms of AIDS )

एड्स (AIDS)। एड्स रोग के फैलने के कारण,लक्षण,निदान,नियंत्रण और उपचार।
एड्स रोग के लक्षण ( Symptoms of AIDS )

किसी रोगी में एड्स होने की सम्भावना व्यक्त की जा सकती है । यदि इनमें निम्नांकित लक्षण दिखाई दे।
• ( 1 ) एड्स के रोगियों में फ्लू ( flu ) रोग की भाँति प्रारम्भिक तौर पर बुखार बना रहता है । इसके पश्चात् सरदर्द ( headache ) , लसिका ग्रन्थियों में सूजन ( swellings of lymph glands ) भार में कमी ( loss of weight ) व सामान्य स्वास्थ्य में गिरावट जैसी व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
• ( 2 ) मस्तिष्क सम्बन्धी व्याधियाँ ( neurologial disorders )- याददाश्त का कम होना , दौरे पड़ना व होशो – हवास में न रहना AIDS की सम्भावना को प्रबल करते हैं ।
• ( 3 ) कैन्सर अर्थात् मैलिग्नेन्सी ( malignancy ) का होना । इसमें कॉपोसीज सार्कोमा ( Kaposi’s sarcoma ) प्रमुख है ।
• ( 4 ) श्वेत रक्ताणुओं की मात्रा में अत्यधिक कमी होना ( leucopenia ) |
• ( 5 ) रक्त प्लेटलेट्स की संख्या में कमी ( thrombocytopenia ) |
• ( 6 ) पेशियों में अकड़न व दर्द , रात्रि के समय अत्यधिक पसीना आना व लैंगिक रोगों जैसे – सिफिलिस ( syphilis ) , गोनोरिया ( gonorrhoea ) इत्यादि का निरन्तर रोगों में बना रहना , एड्स होने के सम्भावित लक्षण हैं ।
• ( 7 ) श्वसन तन्त्र में विसंगतियाँ ( abnormalities in respiratory tract ) इनमें फुफ्फुस का संक्रमण AIDS रोग का मुख्य लक्षण है । निरन्तर रवांस का न आना , छाती में दर्द व सूखी खाँसी इसके अन्य लक्षण हैं ।
• ( 8 ) पाचन तन्त्र में व्याधियाँ ( problems of digestive system )- इनमें बार – बार शौच को जाना , पेट दर्द एवं बेचैनी प्रमुख लक्षण हैं ।
• ( 9 ) T- हेल्पर कोशिकाओं की संख्या में अत्यधिक गिरावट ।
• ( 10 ) प्रतिरोधक तन्त्र निष्क्रिय हो जाता है व रोगी अनेकों रोगाणुओं से संक्रमित हो जाता है व इसमें अनेक बीमारियों उत्पन्न हो जाती हैं ।

एड्स रोग का निदान ( Diagnosis )

निम्नांकित परीक्षणों द्वारा एड्स का निदान किया जाता है
• ( 1 ) रक्त के वाइरोलॉजीकल ( virological ) , इम्यूनालॉजीकल ( im- munological ) व सीरोलॉजीकल ( serological ) परीक्षण किए जाते हैं। HIV को रक्त से पृथक् किया जा सकता है ।
• ( 2 ) ल्यूकोसाइट व T- लिम्फोलाइट की संख्या में कमी से इस रोग का पता लगाया जा सकता है ।
• ( 3 ) रक्त प्लेटलेट्स की मात्रा में कमी से भी रोगी में AIDS का निदान सम्भव है ।
• ( 4 ) AIDS के रोगी में IgG व IgA प्रतिरक्षी काय ( antibodies ) की संख्या में वृद्धि हो जाती है ।
( 5 ) त्वचा के परीक्षणों से कोशिका व्यवहित प्रतिरक्षण ( cell mediated immunity ) का हास होना पाया जाता है ।

एड्स (AIDS)। एड्स रोग के फैलने के कारण,लक्षण,निदान,नियंत्रण और उपचार।
एड्स रोग का परीक्षण।HIV Test
एड्स (AIDS)। एड्स रोग के फैलने के कारण,लक्षण,निदान,नियंत्रण और उपचार।
एड्स रोग का परीक्षण।HIV Test

एड्स का नियन्त्रण ( Control of AIDS )

एड्स का नियन्त्रण ( Control of AIDS )
• ( 1 ) वेश्यावृत्ति पर रोक ( sexual contact with prostitutes be avoided ) |
• ( 2 ) HIV संक्रमित रोगियों को एकान्तवास में रखा जाना चाहिए ।
• ( 3 ) रक्त स्थानान्तरण में HIV मुक्त रक्त ही स्थानान्तरित करना चाहिये ।
• ( 4 ) समलैंगिकता ( homosexuality ) को नकारा जाना चाहिए ।
• ( 5 ) रक्त के माध्यम से नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगानी चाहिए ।
• ( 6 ) टेलीविजन , रेडियो व समाचार – पत्रों के द्वारा लोगों को शिक्षित करना चाहिए ।
• ( 7 ) समाजसेवी संस्थाओं को भी आम जनता को इस रोग के बारे में सावधान करना चाहिए , शिक्षित करना चाहिए ।
• ( 8 ) हॉस्पिटल व डिस्पेन्सरियों में काम आने वाली सूईयों , सिरिन्जों , रूई व अन्य औजारों को रोगाणुरहित ( sterilised ) करना चाहिए ।
• ( 9 ) रक्त दाताओं का निरन्तर परीक्षण करना चाहिए व इनके HIV ( + ve ) होने की स्थिति में इन्हें रक्तदान नहीं करने देना चाहिए ।
• ( 10 ) AIDS विषाणुओं से संक्रमित माताओं के प्रसव पर रोक लगानी चाहिए ।

एड्स का उपचार ( Treatment of AIDS )

एड्स का उपचार ( Treatment of AIDS ) औषधियों के प्रयोग से कुछ हद तक एड्स का उपचार किया जा सकता है । कुछ औषधियाँ रोगी के जीवन व प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक पायी गयी हैं

एड्स (AIDS)। एड्स रोग के फैलने के कारण,लक्षण,निदान,नियंत्रण और उपचार।
एड्स का उपचार ( Treatment of AIDS )


• ( 1 ) एजीडोथायमिडीन ( azidothymidine ) नामक औषधि रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन को रोककर विषाणुओं की पुनरावृत्ति को रोकती है । रिवेवरिन ( rivavarin ) नामक औषधि भी यही कार्य करती है ।
• ( 2 ) एक अमेरिकन कम्पनी ने मुर्गी के अण्डे के पीतक ( Yolk ) से निर्मित तीन प्राकृतिक वसाओं के सम्मिश्रण से एड्स के उपचार हेतु औषधि तैयार की है इसे AL – 721 कहते हैं । इस औषधि को मौखिक रूप से लिया जा सकता है । ऐसा समझा जाता है कि AL – 721 , HIV की कला से कोलेस्ट्रॉल को हटाती है व विषाणु के लिम्फोसाइट में प्रवेश को रोकती है ।
• ( 3 ) AIDS के रोगियों में T- सहायक कोशिकाएँ भी हासित होती हैं , इसका उपचार इनमें अस्थिमज्जा के स्थानान्तरण द्वारा किया जाता है ।
• ( 4 ) वर्तमान में कन्वर्जेन्ट कॉम्बीनेशन थेरेपी द्वारा AIDS का उपचार किया जा रहा है जो विषाणुओं के लिम्फोसाइट्स में प्रवेश एवं वृद्धि को रोकती है ।