गुरुनानक देव का जीवन परिचय । Guru Nanak biography, life story and essay in Hindi .

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  • नानक जी का जन्म तथा बचपन
  • नानक जी का खरा सौदा
  • नानक जी का गृहत्याग और धर्मोपदेश
  • गुरुनानक जी की शिक्षाएँ
  • उपसंहार ।
गुरुनानक देव का जीवन परिचय

गुरुनानक जी का जन्म तथा बचपन

भारत की पवित्र भूमि पर समय – समय पर अनेक महापुरुष उत्पन्न हुए , जिन्होंने लोगों को धर्म का बोध कराया , ईश्वर प्राप्ति का सच्चा मार्ग बताया । इन महापुरुषों में गुरु नानकदेव का नाम सदा स्मरणीय रहेगा ।

नानक जी का जन्म संवत् 1526 में कार्तिक पूर्णिमा को तलवंडी नामक ग्राम में हुआ । तलवंडी का वर्तमान नाम ‘ ननकाना साहब ‘ है । इनके पिता का नाम कालुचन्द पटवारी और माता का नाम तृप्ता था ।

इनकी रुचि बचपन से हा भगवान् की भक्ति की ओर थी । अतः पढ़ने की बजाय वे ईश्वर – स्मरण में ही समय बिताते , जिसे देखकर उन्हें पढ़ाने वाले पंडित और मौलवी दंग रह गए ।

फिर भी , ये संस्कृति और अरबी – फारसी के विद्वान् बन गए । नानक जी को गौएँ व भैसें चराने का काम सौंपा गया । पशु खेत में चरते रहते और ये ईश्वर भजन में मग्न रहते एक बार ये पशु चराते हुए दूर निकल गए और थक गए । धूप प्रचंड थी । ये लेट गए और इन्हें नींद आ गई । तभी एक फनियल साँप ने आकर इन पर छाया कर दी । वहाँ का शासक राय बुलार वहाँ से गुजर रहा था । उसने यह दृश्य देखा तो को हटाने पहुँचा । साँप ने आदमी को देखा तो चुपके से चला गया । रायबुलार बहुत प्रभावित हुआ ।

नानक जी का खरा सौदा

पिता ने नानक को व्यापार में डाला । पिता ने एक बार बीस रुपये देकर लाहौर जाकर सच्चा व्यापार करने को कहा । ये चल पड़े । मार्ग में कुछ साधु मिले जो भूखे थे । इन्होंने सोचा , ” इनकी सेवा करना ही सच्चा व्यापार है । ” बस , गाँव से सब रुपयों का आय , दाल और सामान लाकर साधुओं को भेंट कर दिया । घर आने पर इन्हें बहुत दंड मिला ।

16 वर्ष की आयु में नानक ने मोदीखाने ( सरकारी अनाज की दुकान ) में नौकरी कर ली । यहाँ भी वे अपना वेतन गरीबों और साधुओं को बाँट देते । 18 वर्ष की आयु में सुलक्षणादेवी से आपका विवाह हो गया । इनके दो पुत्र हुए- श्रीचन्द और लक्ष्मीदास भक्ति करने वाले का मन गृहस्थी में कैसे लगता ? ईश्वर की नौकरी करने वाला नवाब की चाकरी कैसे करता ?

नानक जी का गृहत्याग और धर्मोपदेश

गुरु नानक का युग दिल्ली साम्राज्य के पतन का काल था । चारों ओर अत्याचार और अनाचार फैला हुआ था । धर्म के वास्तविक रूप को न हिन्दू समझ रहा था , न यवन । एक ओर योगी , यति , साधु , संन्यासी हिन्दू जनता को मूर्ख बना रहे थे तो दूसरी ओर मुल्ला , पीर , औलिया उलमा मुसलमानों पर अपना रोब जमाए हुए थे । हिन्दू जनता अपना आत्म विश्वास , आत्म – गौरव तथा आत्म – सम्मान खो चुकी थी । हिन्दुओं की असह्य वेदना से पीड़ित नानक घर – बार छोड़कर धर्मोपदेश के लिए चल पड़े ।

ऐमनाबाद पहुँचकर वे लालू बढ़ई के यहाँ ठहरे । एक दिन वहाँ के धनी पुरुष मलक ने उन्हें भोजन के लिए आमन्त्रित किया । नानक जी ने स्वीकार न किया । मलक को क्रोध आया । वह नानक के पास पहुँचा । नानक ने एक हाथ में लालू की रोटी और दूसरे हाथ में मलक की रोटी को लेकर दबाया । लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा , जब लालू की रोटी से दूध की और मलक की रोटी से रक्त की बूँदें टपक पड़ीं । उन्होंने कहा कि लालू का भोजन पवित्र कमाई का है ।

गुरुनानक जी की शिक्षाएँ

गुरु नानक ने इस भाँति ईश्वर के प्रति जनता की रुचि जागृत करते हुए भारत का भ्रमण किया । वे मक्का – मदीना भी गए । वहाँ के मुसलमान उनसे बहुत प्रभावित हुए । गुरु नानकदेव अधिक विद्वान् एवं शास्त्रज्ञानी नहीं थे , किन्तु वे बहुश्रुत तथा निजी अनुभव के धनी अवश्य थे । वे निर्गुण – निराकार ईश्वर की उपासना पर विश्वास रखते थे ।

अन्य सन्तों की भाँति गुरु नानकदेव ने भी अपने उपदेश सीधी सादी सरल भाषा में प्रस्तुत किए । इनके उपदेश थे- सच्चे मन से भगवान् का भजन करो । संयम से जीवन बिताओ । परिश्रम से सच्ची कमाई करो । झूठ मत बोलो , पर – निन्दा और क्रोध मन को अपवित्र करते हैं । मधुर और परहितकारी वचन बोलने चाहिएँ । हमें उस भगवान् को याद करना चाहिए जो जल और थल में समा रहा है । किसी दूसरे शरीरधारी , जन्मने और मरने वाले का नाम नहीं जपना चाहिए ।

गुरु नानक जी की मृत्यु

12 सितम्बर , 1539 को आपने हिन्दू और यवन शिष्यों की उपस्थिति में ‘ तेरा भाणा मीठा लागे ‘ शब्द कहते – कहते अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया । इनके शव को जलाने और गाड़ने के प्रश्न पर हिन्दू और यवनों में झगड़ा होने लगा । झगड़ते हुए जब ये लोग अन्दर गए तो देखा कि सिवाय चादर के वहाँ कुछ नहीं है ।

गुरु नानकदेव की वाणी ‘ गुरु ग्रन्थ साहब ‘ में संगृहीत है । इनकी वाणी में एक अद्भुत प्रेरणादायिनी शक्ति है । इतनी प्रभावोत्पादकता अन्य किसी सन्त कवि की वाणी में नहीं पाई जाती । इस सम्बन्ध में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं- ” जिन वाणियों से मनुष्य के अन्दर इतना बड़ा अपराजेय आत्मबल और कभी न समाप्त होने वाला साहस प्राप्त हो सकता है , उनकी महिमा निःसंदेह अतुलनीय है । सच्चे हृदय से निकले हुए उद्गार और सत्य के प्रति दृढ़ रहने के उपदेश कितने शक्तिशाली हो सकते हैं नानक की वाणियों ने स्पष्ट कर दिया है । ” इनकी वाणी का अध्ययन धार्मिक एवं साहित्यिक , दोनों दृष्टियों से किया जाता है । धार्मिक दृष्टि से सिख धर्मानुयायी तो इसका पाठ और श्रवण करते ही हैं , करोड़ों हिन्दू भी मानसिक शान्ति के लिए गुरुजी की वाणी का पाठ करते हैं ।

गुरु नानक के अनुयायी आज ‘ सिक्ख ‘ धर्मावलम्बी माने जाते हैं और वे गुरु नानक को अपना आदि गुरु मानते हैं

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