आसन अमृत रूप। जानिए आसन अमृत रूप के बारे में।

आसन अमृत रूप। जानिए आसन अमृत रूप के बारे में।

योग के आठ सोपान है जिसमें तीसरा सोपान आसन है। आसन शरीर में अमृत का कार्य करते हैं। तथा आसनों द्वारा स्थूल शरीर को वश में किया जा सकता है। चौथा सोपान प्राणायाम है। सूक्ष्म शरीर या मन को प्रणायाम द्वारा वश में किया जा सकता है।

पाचन संस्थान के अवयव – जैसे अमाशय, यकृत, पित्ताशय, अग्नाशय, पक्वाशय इत्यादि के विभिन्न स्राव स्वाभाविक रूप से समान मात्रा में स्रावित होकर भोजन को पचाते हैं। जो कि प्राकृत रस रक्त व मांस का निर्माण करते हैं।

विकृत हेतु,यथा- भोजन जल विष एवं गरविष ( दो खाद्य पदार्थ या दो औषधियां प्रथक प्रथक रुप से अमृततुल्य कार्य करती हैं। परंतु जब वे विभिन्न संयोग के आयतनों के तहत मिल जाते हैं तब इस प्रकार शरीर धातु गुण विरुद्ध पदार्थ बन जाने को गरविष कहते हैं। जैसे दही के साथ दूध, घी के साथ शहद, नमक के साथ दूध इत्यादि।) के परिणाम स्वरुप कुपित हुए वात, पित्त, एवं कफ चलायमान शाखाओं से होकर व्याधि, यथा – दूषित रक्त के निर्माण स्वरूप यथा अनुसार उत्पन्न कर देते हैं। आसनों के लगातार अभ्यास के परिणाम स्वरूप उपरोक्त अवयवों का रस समान रूप से निर्मित होकर स्वाभाविक क्रिया एवं रचना का अनुसरण करता है।

हृदयाघात के अंतर्गत उक्त भावों के दोषों का विकृत जमाव आसनों के सतत उपयोग के परिणाम स्वरूप हृदय के सामान्य कार्य एवं रचना निर्माण में फलदायक रहता है।