तेजाजी महाराज की कथा व जीवन परिचय। Tejaji maharaj ki katha.

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जीवन परिचय: तेजाजी महाराज को कृषि कार्यों का उप कारक देवता तथा काला व बाला के देवता के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म विक्रम संवत 1130 में माघ शुक्ल चतुर्दशी को धोलिया जाट वंश में खड़नाल नागौर में हुआ था। इनके पिता ताहड़ जी तथा माता रामकुवरी थी।

धोलिया जाट वंश से होने के कारण इन्हें धोलिया वीर के नाम से भी जाना जाता है।

तेजाजी महाराज की कथा। tejaji Maharaj ki katha.

तेजाजी महाराज की कथा – जन प्रचलित मान्यताओं के अनुसार वीर तेजाजी का विवाह बचपन में ही पनेर अजमेर के रामचंद्र जी की पुत्री पेमल के साथ हुआ था। कम उम्र में ही विवाह के कारण उन दोनों को अपने विवाह की जानकारी नहीं थी।

विवाह के कुछ समय उपरांत ही तेजाजी के तथा पेमल के घरवालों के मध्य झगड़ा हुआ उस झगड़े में पेमल के मामा को मार दिया गया जिसकी वजह से उनके विवाह के बारे में उनके घरवालों ने नहीं बताया।

एक बार वर्षा अच्छी होने पर तेजाजी की मां ने उन्हें खेत में हल जोतने के लिए भेजा। खेत में बहुत समय होने के बाद भी उनके लिए खाना नही आया उन्हें बहुत भूख लगने लगी थी उसके बाद उनकी भाभी खाना लेकर आई। खाना लाने में देरी करने के कारण तेजाजी बहुत नाराज व गुस्सा हुए ।

उनके इस तरह गुस्सा होने पर उनकी भाभी ने ताना मारते हुए कहा कि मैं सारे दिन घर का काम करती हूं , बच्चों को रोता छोड़ कर आई हूं। आपको गर्म खाना चाहिए तो अपनी पत्नी जो अपने पीहर में आराम से बैठी है को ले आओ।

अपनी भाभी के कड़वे वचन सुनकर तेजाजी अपनी माता के पास जाते हैं और उनकी माता उन्हें सारी बात बताती है उसके बाद तेजाजी अपनी घोड़ी लीलन पर बैठकर ससुराल पनेर की ओर रवाना होते हैं। ससुराल जाने पर तेजाजी का अपमान किया जाता है जिससे वह क्रोधित होकर वापस आने लगते हैं उनकी पत्नी पेमल को जब यह बात पता चलती है तो वह अपनी सखी लाचा गुजरी के पास जाती है और सारी बात बताती है। पेमल तथा लाचा गुजरी के आग्रह पर तेजाजी लाचा गुजरी के घर पर ठहरते हैं।

उसी रात मेर के मीणा लाचा गुजरी की गायों को चुरा लेते हैं जब सवेरे लाचा गुजरी को अपने गायों के बारे में पता चलता है तो वह रोती बिलखती हुई तेजाजी के पास आती है और गायों की चोरी होने की बात बताती है। लाचा गुजरी की गायों की रक्षार्थ तेजाजी मीणा के पीछे जाते हैं जहां उन्हें रास्ते सेंदरिया (अजमेर) नामक स्थान पर एक सर्प जलता हुआ दिखाई देता है। अपनी दया भावना के कारण तेजाजी अपने भाले से जलते हुए सांप को आग से बाहर निकाल देते हैं जिससे सर्प बहुत क्रोधित हो जाता है।

सर्प ने क्रोध स्वर में कहा कि “मैं आज इस में जलकर इस योनि से मुक्त होना चाहता था किंतु तुमने मुझे मुक्त नहीं होने दिया अब मैं तुम्हें डसूंगा “। तेजाजी ने अपने विनम्र स्वर में कहा कि मुझे अभी अपने कर्तव्य का पालन करने जाना है मुझे गायों को मीणाओं से छुड़ाना है जब मैं वापस आऊंगा तब मुझे डस लेना। तेजाजी ने नागदेवता को वचन दिया नागदेवता ने उनकी यह बात मान ली।

तेजाजी मीणाओं से भयंकर युद्ध करते हुए अपनी सभी गायों को छुड़ाकर ले आते हैं किंतु एक बछड़ा वही रह जाता है, लाचा गुजरी की विनती करने पर तेजाजी वापस बछड़े को छुड़ाने जाते हैं इस युद्ध में वह बहुत अधिक घायल हो जाते हैं उनका पूरा शरीर लहूलुहान हो जाता है। उसके बाद अपने वचन की पालन हेतु नागदेवता के पास जाते हैं और डसने के लिए कहते हैं।

तेजाजी की इस तरह की हालत देख कर नागदेवता उन्हें डसने के लिए मना कर देते हैं और वचन से मुक्त करने की बात कहते हैं लेकिन तेजाजी अपने वचन से बंधे होने के कारण डसने का आग्रह करते हैं इस पर नागदेवता ने कहा कि आपके शरीर पर ऐसी कोई भी जगह नहीं है जहां में अपना दंश कर सकूं।

इस पर तेजाजी ने अपनी जीभ पर डसने के लिए कहा और नागदेवता तेजाजी के भाले के सहारे चढ़कर उनकी जीभ पर दंश करता है। और उनकी इस वचनबद्धता से प्रसन्न होकर नाग देवता ने तेजाजी को आशीर्वाद और वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति जिसे सर्प ने काटा हो अगर वह तुम्हारे थान पर आएगा तो ठीक हो जाएगा तथा तुम्हें काला व बाला के देवता के रूप में पूजा जाएगा।

नागदेवता के डसने के बाद तेजाजी सेंदरिया से चलते हैं और सुरसुरा नामक स्थान पर आकर अपने प्राणों का त्याग करते हैं।

तेजाजी के प्रसिद्ध मंदिर

तेजाजी के मंदिर राजस्थान के लगभग सभी गांवों में हैं ।तथा इनके मंदिर के पुजारी को घोड़ला कहते हैं जिसके द्वारा सर्प दंश से पीड़ित रोगी का जहर चूस कर बाहर निकाला जाता है।

तेजाजी के प्रसिद्ध मंदिर खडनाल (नागौर) ब्यावर, सेंदरिया , भांवता, सुरसुरा (अजमेर) में है।

Note:

वीर तेजाजी पशु मेला परबतसर नागौर में भरता है। जो राजस्थान में सर्वाधिक आय वाला मेला है।

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