शनि प्रदोष व्रत कथा ,Shani pradosh vrat katha

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हिन्दू पंचांग के अनुसार भगवान शिव को समर्पित यह प्रदोष व्रत शुक्ल और कृष्ण पक्ष में आता है , परन्तु प्रदोष व्रत जब शनिवार के दिन पड़ता है उसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है । प्रदोष काल का अर्थ होता है सूर्यास्त के बाद और रात्रि से पहले का समय शनि प्रदोष का व्रत करने वालों पर भगवान शिव के साथ – साथ भगवान शनिदेव की भी असीम कृपा प्राप्त होती है । शनि प्रदोष व्रत को हिन्दू धर्म में बहुत शुभ माना गया है । इस व्रत को करने से सभी कष्टों का निवारण होता है तथा मृत्यु के बाद उन्हें मोक्ष की भी प्राप्ति होती है ।

शनि प्रदोष के दिन सूर्य उदय होने से पहले उठें और स्नान करके साफ कपड़े पहनें । फिर गंगा जल से पूजा स्थल को शुद्ध करें और अक्षत , दीप , धूप से भगवान शिव की पूजा करें । इसके बाद शनिदेव के मंदिर जाकर विधिवत रूप से भगवान शनिदेव की पूजा करें । उसके बाद शनिदेव जी के मंत्रों का जाप करें और फिर शनि जी पर जल चढाए , फिर शनि देव की आराधना के लिए सरसों के तेल का दीया पीपल के पेड़ के नीचे जलाएं । एक दीया शनिदेव के मंदिर में जलाएं । शाम को गरीब ब्राह्मणों को भोजन कराएं , और इच्छानुसार दान दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें और स्वयं भी भोजन ग्रहण करें ।

शनि प्रदोष व्रत कथा

शनि प्रदोष व्रत कथा

प्राचीनकाल में एक नगर सेठ थे। सेठजी के घर में हर प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं लेकिन संतान नहीं होने के कारण सेठ और सेठानी हमेशा दुःखी रहते थे।

काफी सोच-विचार करके सेठजी ने अपना काम नौकरों को सौंप दिया और खुद सेठानी के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। अपने नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले, जो ध्यानमग्न बैठे थे। सेठजी ने सोचा, क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए।

सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गए। साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। साधु ने सेठ और सेठानी से कहा कि मैं तुम्हारा दुःख जानता हूं। तुम शनि प्रदोष व्रत करो, इससे तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा।

साधु ने सेठ-सेठानी प्रदोष व्रत की विधि भी बताई और भगवान शंकर की यह वंदना बताई।

शनि प्रदोष व्रत विधि

शनि प्रदोष व्रत के दिन व्रत करने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान कर भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। दिन भर मन में ” ओम नमः शिवाय” का जाप करें। दिन भर निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त से तीन घंटे पहले भगवान शिव जी की पूजा करनी चाहिए। शनि प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 से 7:00 बजे के बीच की जाती है।

भक्त को शाम को फिर से स्नान करना चाहिए और साफ सफेद कपड़े पहनना चाहिए। पूजा स्थल को साफ करें। भक्त चाहे तो शिव मंदिर में जाकर पूजा भी कर सकता है। पांच रंगों की रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजा के लिए सभी सामग्री एकत्र करें। कलश या लोटे में शुद्ध जल भरें। कुश आसन पर बैठकर विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करें। ” ओम नमः शिवाय” कहते हुए भगवान शिव को जल अर्पित करें। इसके बाद हाथ जोड़कर शिव जी का ध्यान करें।

ध्यान के बाद शनि प्रदोष व्रत की कथा सुनें या पढ़ें। कथा समाप्त होने के बाद हवन सामग्री को मिलाकर 11 या 21 या 108 बार “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा ” मंत्र से आहुति दें । इसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित लोगों की आरती उतारें। सभी को प्रसाद बांटें। इसके बाद भोजन करें। खाने में मीठी चीजों का ही इस्तेमाल करें।

शनि प्रदोष व्रत का महत्व

शास्त्रों में प्रदोष के व्रत को श्रेष्ठ व्रतों में से एक माना गया है. ये व्रत महादेव को अत्यंत प्रिय है और हर मनोकामना को पूर्ण करता है. इस व्रत को रखने वाले को लंबी आयु, सौभाग्य, पुत्र रत्न धन, वैभव आदि सब कुछ प्राप्त होता है. शनिवार के प्रदोष व्रत के दिन शनिदेव की भी पूजा करनी चाहिए. इससे शनि संबन्धी कष्ट दूर होते हैं.

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