हेपेटाइटिस बी अथवा यकृत शोथ रोग। hepatitis b in hindi.

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हेपेटाइटिस अर्थात यकृत शोथ यकृत का रोग है। जिसमें यकृत में सूजन आ जाती है। यह क्रिया पांच प्रकार के विषाणुओ के संक्रमण के कारण हो सकती है। इस आधार पर हेपेटाइटिस A,B,C,Dऔर E में वर्गीकृत किया जाता है। सभी विषाणु तीव्र रोग उत्पन्न करते हैं जिन के लक्षण अनेक सप्ताह तक बने रहते हैं। इसमें त्वचा का वर्ण, नेत्र व नाखून पीले पड़ जाते हैं। मूत्र का रंग गहरा पीला हो जाता है जिसे सामान्यता पीलिया कहते हैं। रोग के दौरान अत्यधिक थकान, नाक का बहना, उल्टी आना और पेट में दर्द रहता है। रोग के कारण व्यक्ति में अत्यधिक कमजोरी आ जाती है तथा ठीक होने में अधिक समय लगता है ।

हेपेटाइटिस बी (about hepatitis b)

हेपेटाइटिस बी अथवा यकृत शोथ रोग। hepatitis b in hindi.
हेपेटाइटिस बी

हेपेटाइटिस बी मानव जाति का एक महत्वपूर्ण रोग है जो पूरे विश्व में जन स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। इस रोग का उपचार संभव है इसके लिए स्वस्थ सुरक्षित टीका लगवाना आवश्यक है। hepatitis B का टीका 1982 से उपलब्ध है। इस रोग से 2 खरब लोग पीड़ित हो चुके हैं जिनमें से 500 मिलियन में तीव्र संक्रमण के कारण यकृत का सिरोसिस हो चुका है। और कैंसर के कारण मृत्यु के द्वार पर खड़े हैं तीव्र संक्रमण की अवस्था में टीका रोग को पूर्णता जड़ से ठीक कर पाने में असमर्थ होता है। अतः इस बात का ध्यान रखना अति आवश्यक है कि टीका रोग होने से पूर्व या प्रारंभिक अवस्था में लगवा लेना चाहिये। यह रोग विकसित एवं विकासशील देशों में अधिकतर लोगों को बचपन में ही हो जाता है। इस रोग का प्रभाव सहारा अफ्रीका, एशिया के अधिकतर भाग, यूरोप का पूर्वी व केंद्रीय भाग मध्य पूर्व में है।

यह रोग अधिकतर 1 से 4 वर्ष की उम्र के बच्चों में हो जाता है। इसमें से 30 से 50% बच्चों में यह तीव्र संक्रमण उत्पन्न करता है ऐसे लोगों में 25% को कैंसर से मृत्यु का खतरा रहता है।

हेपेटाइटिस बी कैसे फैलता है। reason of infection.

यह रोगी के रक्त व रक्त उत्पाद जैसे कि प्लाज्मा, सिरम एल्बुमिन एवं अन्य कारक या दैहिक तरल के संपर्क में आने से स्वस्थ व्यक्ति को हो सकता है। अर्थात यह एड्स कि भाति फैलता है। किंतु एड्स की अपेक्षा 50 से 100% अधिक संक्रमण क्षमता रखता है। संक्रमण होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।

(1) रोगी माता से शिशु को गर्भ के दौरान हो सकता है।

(2) गंदे तीखे औजारों या सुई के चुभने से।

(3) असुरक्षित हुई अथवा रक्ताधान द्वारा।

(4) संक्रमित बच्चे से स्वस्थ शिशु को।

(5) समलैंगिक संबंधों के द्वारा।

(6) रोगी के द्वारा उपयोग किए गए टूथब्रश या रेजर के उपयोग से।

(7) असुरक्षित लैंगिक संबंधों के द्वारा।

उपरोक्त बिंदुओं के आधार पर वयस्कों में यह रोग असुरक्षित सुई के उपयोग या रक्ताधान अथवा खुले लैंगिक संबंध स्थापित करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के कारण फैलता है। यह रोग संक्रमित भोजन, जल आदि के कारण उत्पन्न नहीं होता है। संक्रमित व्यक्ति के सीरम के मुख से ग्रहण करने पर रोग हो सकता है। एक बार हेपेटाइटिस बी का विषाणु रोगी की देह में आने के उपरांत जीवन पर्यंत बना रह सकता है। यह रोग हाथ मिलाने से गले मिलने से या संक्रमित रोगी के पास बैठने से नहीं होता है।

रोगजनक (causative agent). हेपेटाइटिस बी किसके द्वारा होता है।

मैककेल्लम ने 1947 में सर्वप्रथम हेपेटाइटिस ए व हेपेटाइटिस बी नामों का उपयोग इस महामारी हेतु किया। जिसे सीरम हेपेटाइटिस भी कहते हैं। विषाण्विक ए हेपेटाइटिस गुदीय, मुखपथ द्वारा जबकि बी हेपेटाइटिस प्राथमिक तौर पर जन्म के समय ही जनको द्वारा शिशु में होता है।

1973 में हेपेटाइटिस बी के रोगियों के सीरम में विषाणु समान कण पाए गए। इन्हें हेपिटाइटिस B विषाणु HBV नाम प्रदान किया गया। रॉबिंसन ने इस विषाणु के जीनोम की खोज की यह विषाणु हेपेटाइटिस बी विषाणु कहलाता है

हेपेटाइटिस बी की जांच कैसे होती हैं।

हेपेटाइटिस बी अथवा यकृत शोथ रोग। hepatitis b in hindi.
हेपेटाइटिस बी

(1) रोगी के रक्त का परीक्षण किया जाता है रक्त में HBs एंटीजन के पाए जाने पर यह तय हो जाता है कि रोगी के देह में हेपेटाइटिस बी का संक्रमण हो गया है।

(2) चिकित्सक यकृत की बायोप्सी करके यकृत में रोगी की स्थिति की जांच करते हैं।

हेपेटाइटिस बी के उपचार और रोकथाम। hepatitis b treatment and prevention in hindi.

हेपेटाइटिस बी रोग का कोई विशिष्ट उपचार नहीं होता है। हेपेटाइटिस बी हेतु प्रतिरक्षी सिरम ग्लोबुलीन जो एंटी एचबीएस से तैयार किया गया है के अंतरापेशी इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इसके टीके लगाने से कुछ लाभ रोगी होने की अवस्था में हो सकता है। इसका टीका शुद्ध HBs एंटीजन से प्राप्त किया जाता है। यह एंटीजन हेपेटाइटिस बी रोग वाहक के प्लाज्मा से प्राप्त किया जाता है। अतः महंगा होने के साथ ही उपलब्ध भी कम मात्रा में होता है। टीके से रोग के प्रति काफी सुरक्षा की जा सकती है रोगी के रक्त का परीक्षण करके इसकी जांच की जाती है।

रोगी के उपचार हेतु इंटरफेरॉन दिया जाता है। अधिकतर रोगी 4 माह में ठीक हो जाते हैं। एक औषधि लेमीव्यूडिन के 1 वर्ष तक लेने से लाभ होता है। यकृत देह के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अंग एवं ग्रंथि है। यह अनेक कार्य करता है। अतः खराब हो जाने की स्थिति में यकृत का प्रत्यारोपण किया जाता है। यकृत में कैंसर होने के बाद कम लोग ही जीवित रह पाते हैं यह 35 से 65 वर्ष की आयु में होता है।

हेपेटाइटिस बी रोग की रोकथाम के लिए निम्न सुरक्षात्मक उपाय अपनाए जा सकते हैं।

(1) पूर्व में काम में ली गई सुइयों का उपयोग ना करें।

(2) यदि आप रक्त को स्पर्श करते हैं तो दस्तानों का प्रयोग करें।

(3) लैंगिक संबंध स्थापित करते समय कंडोम का प्रयोग करें।

(4) यदि देह को भेदना या बेधन कराना हो तो निर्मित औजारों का प्रयोग करें।

(5) रोगी के टूथब्रश रेजर या अन्य वस्तुएं जहां रक्त का स्पर्श होता हो उपयोग में ना लें।

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